Monday, 12 April 2010

फिर मिलेंगे ..........

अभी एक या दो दिन पहले मैंने किसी चैनल पर एक फिल्म देखी जिसका शीर्षक था........फिर मिलेंगे.......इससे पहले मैंने ये फिल्म कभी नहीं देखी थी,कभी कुछ आधा-अधूरा सा सुना था इसके बारें में लेकिन जब मैंने इसे देखा तो पहले तो मुझे यकीन नहीं हुआ कि अभी भी सार्थक सिनेमा जीवित है और इस फिल्म ने मेरे दिल-ओ -दिमाग पर ऐसी छाप छोड़ी और मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया .......अब आप सोचेंगे कि क्या सोचने पर मजबूर किया ?दरअसल ये फिल्म आधारित है एड्स विषय पर ...इस फिल्म कि मुख्य पात्र है शिल्पा शेट्टी जो एक बड़ी विज्ञापन कम्पनी में काम करती है और एक दिन अचानक उसे पता चलता है कि उसे एड्स हो गया है। वो भावुक होकर ये बात अपने बॉस को बता देती है और फिर वही होता है जिसका अनुमान कोई भी आसानी से लगा सकता है,एक एड्स के मरीज़ को अपने ऑफिस में रखना ये बात उसके बॉस को नागवार गुजरती है और वो उस पर ये इल्ज़ाम लगाकर कि वह अपने काम में लापरवाही करती है,उसे नौकरी से निकाल देता है। फिल्म में शिल्पा ने तमन्ना नाम की युवती का किरदार निभाया है जो एड्स से पीड़ित है,और कितनी ख़ूबसूरती से निभाया है इस किरदार को उन्होंने, एचआईवी+ होने का दर्द उनके चहरे पर साफ दिखाई देता है बहरहाल अपने देश में क्या पूरी दुनिया में ना जाने कितनी तमन्ना हैं जिन्हें एचआईवी + होने का ये खामियाज़ा भुगतना पड़ता है और इस तरह के व्यवहार से रु- ब-रु होना पड़ता है। एड्स मरीजों की तादात जिस रफ़्तार से बढ़ रही है वो खतरे की घंटी है। ये तो हम सब को पता है कि एड्स एक लाइलाज बीमारी है और ये कैसे हो सकती है ये भी बताने कि जरुरत नहीं है,हम सब जानते हैं,सब समझते हैं फिर भी एड्स कि बीमारी कम होने का नाम ही नहीं ले रही बल्कि इसके मरीजों की संख्या बढती ही जा रही है। बात करतें हैं एड्स रोगियों के साथ होने वाले भेद भाव की....उनके साथ हम इतने कठोर कैसे हो सकते हैं,अगर कोई एचआईवी + है तो इसका मतलब ये नहीं कि उसकी जिन्दगी ख़त्म हो गई,उसे पूरा हक है अपनी जिन्दगी को अपने ढंग से जीने का,उसे भी वही सब अधिकार हैं जो किसी भी सामान्य इन्सान को होते हैं ।सपने देखने का,अपनी इच्छाओं को पूरा करने का और फिर चाहे पढाई का अधिकार हो या जॉब करने का,उससे ये अधिकार कोई नहीं छीन सकता अगर कोई ऐसा करता है तो ये मानवता के विरुद्ध है और महा पाप है। फिल्म में यही दिखाया गया है कि कैसे तमन्ना अपने हक की लड़ाई को लडती है और तमाम मुश्किलों को पार करने के बाद आखिर में जीत भी उसी की होती है। अपने हक और मान-सम्मान के लिए लड़ना कोई गलत काम नहीं है,ये सबका अधिकार है। एड्स के मरीज़ हमारी दया के नहीं बल्कि सहयोग के पात्र हैं,वो भी हमारे समाज का हिस्सा हैं इस बीमारी कि वजह से हम उन्हें अपने से अलग नहीं कर सकते,उन्हें भी जीने और खुश होने का हक है। छोटी-छोटी खुशियों को अपने दामन भर लेने का हक है। आइये....आगे बढ़कर इन लोगों का हाथ थामे और सामान्य जीवन जीने में इनका सहयोग करें.....जिन लोगों को मेरी बात समझ ना आए या अटपटी लगे वो यह फिल्म जरूर देखें और सार्थक सिनेमा को सराहें....इसी कारण मैंने इस लेख का शीर्षक नहीं बदला......फिर मिलेंगे ........



7 comments:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    ReplyDelete
  2. "वो भावुक होकर ये बात अपने बॉस को बता देती है और फिर वही होता है जिसका अनुमान कोई भी आसानी से लगा सकता है"
    सच्चा और सार्थक आलेख.

    ReplyDelete
  3. बहुत देर कर दी आपने फिल्म देखने में

    ReplyDelete
  4. हंस कर जी कर सुमन बन, सपने कर आबाद |
    इस सुमन का मोल क्या , मुरझाने के बाद ||

    ReplyDelete
  5. इस नए चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

    ReplyDelete
  6. कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

    धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

    कलम के पुजारी अगर सो गये तो

    ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ , साथ हीं जनोक्ति द्वारा संचालित एग्रीगेटर " ब्लॉग समाचार " http://janokti.feedcluster.com/ से भी अपने ब्लॉग को अवश्य जोड़ें .

    ReplyDelete