Thursday, 15 December 2011

एफडीआई /वॉल मार्ट आखिर माज़रा क्या है...????


भारतीय संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले महंगाई -भ्रष्टाचार और विदेशों में जमा काला धन कुछ ऐसे मुद्दे थे जिन पर संसद में शोर-शराबा होना तय माना जा रहा था लेकिन हुआ यह कि सरकार ने एफ.डी.आई या आम आदमी की भाषा में वॉल मार्ट कहा जा रहा है का नया शगूफा छोड़कर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
अब स्तिथि यह है कि जन साधारण की समझ में यह नहीं आ रहा कि अपनाया जाये या ठुकराया जाये। असल मुद्दे पर आने से पहले इस देश की राजनीति की कुछ विशेषताओं का उल्लेख करना जरूरी है। सांसदों के वेतन और भत्तों को बढ़ाने का प्रस्ताव हो तो संसद में अदभुत एकता का मंज़र दिखाई पड़ता है लेकिन सरकार..द्वारा प्रस्तुत किसी भी प्रस्ताव या सुझाव का आँख बंद करके विरोध करना विपक्षी अपना राजनैतिक धर्म मानते हैं।
एफ.डी आई या वॉल मार्ट के मुद्दे पर भी ऐसा ही कुछ हुआ है। एफ डी आई के मुद्दे को अचानक उछालने के पीछे सरकार की क्या नीयत या मजबूरी थी यह अभी स्पष्ट नहीं थी !लेकिन इतना तो साफ़ नज़र आ रहा है कि सत्ता पक्ष के लोग जी जान से किसानो और उपभोक्ताओं को यह समझाने में जुटें हैं कि एफ डी आई से किसानो को उन के उत्पाद का अच्छा दाम मिलेगा और उपभोक्ता को सस्ते दामों पर अच्छा सामान मिलेगा क्योकि इस कारोबार में बिचौलिए नहीं होंगे। लेकिन हमारे देश के सामाजिक ताने-बाने को देखते हुए इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है...
हम सभी जानतें हैं कि इस देश की ७०% जनता गाँव में बसती है जिसका मुख्य व्यवसाय खेती है। इस ७०% में से ६०% छोटे वर्ग के किसान हैं जिनके पास ट्रैक्टर या थ्रेशर जैसे कृषि के आधुनिक यन्त्र नहीं हैं। देश के बहुत सारे भूभाग की खेती वर्षा पर निर्भर है जहाँ मोटे अनाज ही उगाये जा सकतें हैं । इन हालात में कितने प्रतिशत किसान लाभान्वित होंगे इसका सर्वेक्षण कराया जाना आवश्यक है।
वॉल मार्ट किसी भी किसान से आँख बंद करके उसका उत्पाद नहीं खरीदेगा। उत्पादों की खरीद के मानक तैयार किए जायेंगे और जो उत्पाद उन मानकों पर खरे उतरेंगे केवल उन्ही की खरीद होगी,बाकी उत्पाद तो वही पुरानी मंडियों में बिचौलियों के माध्यम से बिकेगा। अतः एक आम किसान को कितना फायदा होगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
अब बात करतें हैं खुदरा व्यापारियों की,उनका कहना है कि वॉल मार्ट के आने से उनके कारोबार पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है क्योकि उनके ग्राहकों में हर वर्ग के लोग शामिल हैं और हर क्वालिटी का सामान बिकता है और ७०% से ८०% तक ग्राहक उधार सामान खरीदतें हैं इसलिए ग्राहकों का एक बड़ा और खास वर्ग हर हाल में हमारे पास ही आयेगा ,वॉल मार्ट में हमारे जैसी सुविधाएँ नहीं होंगी। इन बातों में भी दम है । कुछ उच्च वर्ग के लोगों की इच्छा है कि बढ़िया क्वालिटी का सामान....विशेषकर ब्रांडेड कपडे,जूते,परफ्यूम आदि हमारे देश में भी उपलब्ध हो जाएँ तो विदेशों में रहने वाले मित्रों या रिश्तेदारों को कष्ट देने की जरुरत न पड़े।
मेरे हिसाब से एफ डी आई के कारण न तो देशवासियों को कोई विशेष लाभ होगा और न कोई नुकसान होगा। कुछ गिने-चुने बिचौलियों के मुनाफे में कमी जरूर आ सकती है। इस मसले पर खुली बहस होने के बाद ही कोई निर्णय लिया जाये तो वही देश हित में होगा।
पूजा सिंह आदर्श

Saturday, 19 November 2011

ऑनर किलिंग:इंसानियत पर धब्बा..


अभी हाल में ही मथुरा ऑनर किलिंग मामले में अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया,जिसमे आठ लोगों को फाँसी की सजा तथा सत्ताइस को उम्र कैद की सजा सुना दी। ये बात अलग है कि ये फैसला आते-आते २० साल लग गए। मेहराना के बहुचर्चित ऑनर किलिंग मामले में अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए इस जघन्य तिहरे हत्याकांड के लिए ८ दोषियों को फाँसी और २७ को उम्र कैद की सजा सुनाई। इन लोगो ने गाँव में हुई पंचायत में पंच की भूमिका निभाते हुए,स्वर्ण युवती और दलित प्रेमी सहित तीन लोगों को सरेआम फाँसी पर लटका दिया था और बाद में उनके शवों को शमशान ले जाकर जला दिया। मुकदमे की सुनवाई के दौरान १३ आरोपियों की मौत हो चुकी है। फाँसी की सज़ा पाने वालों में एक जिला स्तरीय अधिकारी भी शामिल है। देश के न्याय के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी जिला स्तरीय अधिकारी को फाँसी की सज़ा हुई हो।
ऑनर किलिंग या सम्मान के लिए हत्या,जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है और सभी वाकिफ हैं,बताने की जरुरत नहीं है लेकिन यहाँ एक बार फिर बताने की जरुरत महसूस हो रही है कि कैसे अपनी झूठी शान और ऊँची नाक के लिए लोग मासूम लोगों की जान ले लेते हैं। सम्मान हत्या वह हत्या है जिसमे किसी परिवार ,वंश या समुदाय के किसी सदस्य की (आमतौर पर एक महिला)की हत्या उसी परिवार,वंश या समुदाय का एक या एक से अधिक सदस्य (अधिकतर पुरुष)द्वारा की जाती है। और हत्यारे (आमतौर पर समुदाय के अधिकतर सदस्य )इस विश्वास के साथ इस हत्या को अंजाम देते हैं कि मरने वाले सदस्य के कृत्यों के कारण उस परिवार,वंश,या समुदाय का अपमान हुआ है। अपमान की यह धारणा सामान्यतः कई कारणों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है-
१-परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर अपनी मर्ज़ी से प्रेम-विवाह करना।
२-यदि विवाह अंतरजातीय हो अथवा एक ही गोत्र में किया गया हो(हिन्दुओं में)।
३-परिवार द्वारा नियत विवाह से इंकार करना।
४-समुदाय द्वारा निर्धारित वस्त्र संहिता का उल्लंघन कर कोई अन्य परिधान पहनना।
५-विवाह पुर्व या विवाहोपरांत किसी अन्य पुरुष या महिला के साथ यौन-सम्बन्ध स्थापित करना।
ये हत्याएं इस धारणा का परिणाम है कि कोई भी व्यक्ति जिसके किसी कृत्य के कारण यदि उसके कुल या समुदाय का अपमान होता है तो उस कुल के सम्मान की रक्षा के लिए उस व्यक्ति विशेष की हत्या जायज़ है।
संयुक्त राष्ट्र जनसँख्या कोष(यू.एन.पी.ए)का अनुमान है कि दुनिया भर में सालाना ५००० के लगभग हत्याएं,सम्मान हत्याएं होतीं हैं। जिनमे से अकेले १००० हत्याएं भारत में होतीं हैं।जिसमे प.उत्तरप्रदेश,पंजाब ,हरियाणा,और महाराष्ट्र सबसे आगे है. आंकड़े चौकाने वाले जरूर हैं...कि दुनिया भर में होने वाली ५००० सम्मान हत्याओं में से १००० हत्याएं सिर्फ हमारे देश में होतीं हैं। एक बेहद गंभीर विषय जिस पर त्वरित कार्यवाही की और संजीदगी से सोचने की जरुरत है।
मानव अधिकार संस्था सम्मान हत्या को कुछ इस तरह परिभाषित करती है...."सम्मान की रक्षा के लिए किए गए अपराध ,हिंसा के वो मामले हैं,जिन्हें परिवार के पुरुष सदस्यों ने अपने ही परिवार की महिलाओं के खिलाफ इसलिए अंजाम दिया है क्योंकि उनके अनुसार उस महिला सदस्य के किसी कृत्य से समूचे परिवार की गरिमा और सम्मान को ठेस पहुँचती है। इसका कारण कुछ भी हो सकता है,जैसे-अपनी मर्ज़ी से प्रेम-विवाह करना,परिवार के खिलाफ जाना,किसी यौन अपराध का शिकार बनना,पति से (प्रताड़ना देने वाले पति से भी)तलाक की मांग करना या फिर अवैध सम्बन्ध रखने का संदेह। केवल यह धारणा ही उस महिला सदस्य पर हमले को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त है कि उसके किसी कदम से परिवार की इज्ज़त को बट्टा लगा है। "
मानव अधिकार संस्था ने ऑनर किलिंग को सही परिभाषित किया है। समाज के ठेकेदार बनकर जो लोग बैठे हैं उन्हें तो यही लगता है कि जो उनकी दो कौड़ी की झूठी इज्ज़त को को बट्टा लगाये उसे मौत के घाट उतार दो। किसी की भी जिन्दगी छीनने का हक पता नहीं इन लोगों को किसने दिया???किसी से प्यार करना या अपनी मर्ज़ी से किसी को अपना जीवन साथी बनाना क्या वाकई इतना बड़ा गुनाह है ,जिसके लिए किसी को इतनी बेरहमी के साथ सज़ा-ए-मौत दे दी जाये। ........एक सवाल समूचे समाज के सामने ,जिससे न तो भागा जा सकता है और न ही मुंह मोड़ा जा सकता है????? क्योंकि ये वो नासूर बन चुका है जिसमे बदबूदार मवाद पनप गया है ,जब तक इसकी सफाई नहीं की जाएगी ये टीस देता रहेगा पूरे समाज को। और इसकी सफाई के लिए हमें हिम्मत और पहल दोनों करनी होगी। समाज ठेकेदारों को उसी भाषा में समझाना होगा जो उनके समझ में आती है। किसी को जिन्दगी दे नहीं सकते तो फिर किसी की जीती-जागती,हंसती-खेलती जिन्दगी को आग में जिन्दा जलाने या फिर सरेआम फाँसी पर लटका देने का हक इन ज़ालिम हुकुमरानों को किसने दिया ????? जिला अपर सत्र न्यायालय ने इसे जघन्यतम कृत्य माना है और यकीनन ये घिनौना कार्य है। न जाने कितने मासूम इस झूठी शान की भेंट चढ़ गए चाहे वो नितीश कटारा हो,चाहे आरुषि हो या फिर निरुपमा ये वो बहुचर्चित केस हैं जो कही न कही ऑनर किलिंग से जुड़े हैं और जिन्होंने पूरे देश को हिला कर रख दिया था और आज भी ये अपनी मौत का इन्साफ मांग रहे हैं।
२० साल से चल रहे इस मामले में अब जाकर कही फैसला आया है. इतने वर्ष लग गए इसे आने में कि फैसला आने से पहले ही कुछ लोग स्वर्गवासी हो गए । तो कहीं न कहीं हमारी कानून व्यवस्था भी इस तरह के अपराधों के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। गुनाह करने वाले जानते हैं कि पहली बात तो ये कि वो पकडे नहीं जायेंगे और अगर पकडे भी गये तो फिर लम्बी मुकदमेबाजी होगी जिसका अंजाम भी किसने देखा है। बहरहाल जो भी है ये फैसला यकीनन ऐतिहासिक है जुर्म करने वाले कम से कम एक बार सोचेंगे तो जरूर कि अगर ऐसा कुछ भी किया तो अंजाम यही होगा।
जियो और जीने दो पर यकीन करना पता नहीं कब सीखेंगे लोग....जिन्दगी ऊपरवाले की दी हुई नियामत है इसे किसी को भी छीनने का कोई हक नहीं है। प्यार करना कोई गुनाह तो नहीं..इबादत है। इसके लिए मौत कि सज़ा क्यों ???
पूजा सिंह आदर्श

Monday, 3 October 2011

कन्या पूजन करें लेकिन उसे जीने का हक भी तो दें.....


शारदीय नवरात्र चल रहे हैं,आज अष्टमी है,बहुत सारे लोग आज के दिन उपवास पूरा करके कन्या पूजन करते हैं। छोटी-छोटी कंजकों को लाल चुनरी ओढाकर,उनके पैर छूकर उनको जिमाते हैं। नारी को माँ दुर्गा का रूप माना जाता है। कहा जाता है कि नारी में उतनी ही शक्ति है जिनती कि माँ दुर्गा में ..और है ..इसमें लेश मात्र भी संदेह नहीं है। औरत जब अपनी पे आ जाये तो क्या नही कर सकती। इतिहास गवाह है इस बात का कि जब -जब महिलाओं को अग्नि -परीक्षा देनी पड़ी है उसने सिद्ध किया है अपने आपको।लेकिन सवाल ये उठता है कि परीक्षा सिर्फ महिलाओं को ही क्यों देनी पड़ती है ??????और उनसे ही क्यों मांगी जाती है ?? पुरुष क्या धरती पर सदैव महापुरुष या भगवान का रूप लेकर आतें हैं ?? हमारे देश में महिलाओं को देवी का दर्ज़ा दिया जाता है,विभिन्न रूपों में उसकी पूजा होती है।लेकिन इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि जैसा हम कहते हैं ,वैसा करते नहीं हैं। इतिहास में अगर महिलाओं की वीर गाथा मौजूद है तो उनपर हुए अत्याचार भी स्पष्ट देखे जा सकते हैं। और यही दस्तूर आज तक कायम है । नारी की पूजा किए जाने वाले देश में आज उसकी हालत बाद से बदत्तर हो गई है।
देश तरक्की कर रहा है,बहुत कुछ बदलाव भी आया है। आज लड़कियां पढ़-लिख रही हैं ,अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं । मर्दों के वर्चस्व वाले समाज में अपनी जगह बनाने कि कोशिश भी कर रही हैं। ये सब तो ठीक है लेकिन ये सिक्के का बस एक ही पहलू है....दूसरी तरफ वो भयानक तस्वीर है,जिसे कोई देखना ही नही चाहता...चलिए रूबरू करातें हैं आपको इस तस्वीर से। जिस देश में लड़किओं को देवी मानने का दावा किया जाता है ,उसी देश के एक शहर में १०० से ऊपर अजन्मी बच्चियों के भ्रूण मिलते हैं , जिन्हें चील-कौव्वे और कुत्ते नोच-नोच कर खाते हैं। देश का गौरव कही जाने वाली यहाँ कि राजधानी में हर १ घंटे में ३ बलात्कार होतें हैं। लड़किओं और महिलाओं के साथ छेड़खानी किस शहर,किस गली,किस नुक्कड़ पर रोज़ नही होती। घरेलू हिंसा का शिकार होने वाली भी कोई और नही महिलाएं ही होती हैं जो चुपचाप अपने ऊपर होने वाली प्रताड़ना को सहती रहती हैं और ये चुप्पी शायद ही कभी टूटती हो। पढने-लिखने से लेकर जिन्दगी के हर छोटे-बड़े फैसले में कुर्बानी सिर्फ लड़किओं को ही देनी पड़ती है। न उन्हें कानून पता है और न ही अपने अधिकार और न ही कोई उन्हें ये सब बताने की जरुरत समझता है।
अब जहाँ देवी स्वरुप नारी पर इतने अत्याचार हों,उसके साथ इतने अन्याय होते हों,जहाँ उसे जन्म लेने तक की अनुमति न हो...वहां कन्या के रूप में उसकी पूजा करना ढोंग मात्र नही लगता। नवरात्रि में अष्टमी और नवमी के दिन ही कन्याओं की याद क्यों आती है....कन्या पूजने वालों को ????क्यों बाकि का पूरा साल अपमान और अत्याचार करते हुए ही निकाल देना तो जैसे जन्म सिद्ध अधिकार है हमारा। जब महिलाएं अपने ही देश ,अपने ही घर में सुरक्षित नहीं है तो फिर आगे कुछ कहना व्यर्थ है। हमें अपने आप को सभ्य कहने का कोई हक नही है अगर हम महिलाओं का सम्मान नहीं कर सकते। हम वास्तव तभी तरक्की करेंगे जब हमारे देश की आधी आबादी यानि महिलाएं बिना किसी डर के ,बिना किसी दवाब के और भयमुक्त वातावरण में जी सकें और खुली हवा में आज़ादी के साथ सांस ले सके। और ये तभी संभव हो सकेगा जब हम अपने अंदर ही बदलाव लायेंगे ,अपनी सोच को बदलेंगे । जब हमें ये अहसास होगा कि औरत भी इंसान है उसकी भी अपनी भावनाएं हैं ,जब उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है तो उसे भी दुःख होता है ।
बच्चियों को जन्म लेने दें,उनकी हत्या न करे ,ये सबसे बड़ा गुनाह है , ये हमें समझना होगा । जैसे हम अपने घर की बहू-बेटियों को इज्ज़त देतें हैं वैसे ही दूसरों की बेटियों को भी दे । इसके लिए जरूरी है कि हम पहले अपने घर की बेटियों को सम्मान दें। उन्हें जीने का हक दें ,अपने सपनो को पूरा करने का हक दें । तभी कन्या पूजन करने का अधिकार है हमें । अन्यथा इस दिखावे की कोई जरुरत नहीं है।
पूजा सिंह आदर्श

Wednesday, 21 September 2011

मिड-डे-मील.या आत्मसम्मान का क़त्ल ..


साक्षरता की कमी या यूँ कहे कि निरक्षरता हमारे देश की सबसे बड़ी व गंभीर समस्या है ...आज भी गाँव-देहात की बात तो छोड़ दें ,शहरों में भी बच्चे स्कूल नहीं जाते या अगर गए भी तो कक्षा ५ के बाद स्कूल जाना बंद। माध्यमिक और उच्च शिक्षा तो बहुत दूर की कौड़ी है। हम आज भी विकासशील देशों की श्रेणी में आते हैं... क्यों????इसके पीछे साक्षरता की कमी बहुत बड़ा कारण है। जिस देश के नौनिहाल ही अनपढ़ होंगे उस देश का मुस्तकबिल कैसा हो सकता है??एक संजीदा सवाल ,,पूरे समाज के सामने ??
देर से ही सही लेकिन ये बात हमारी सरकार को समझ में आई। इसीलिए सरकार ने ग्यारवीं पंचवर्षीय योजना में साक्षरता को शामिल कर लिया है। अब देश में संपूर्ण साक्षरता लक्ष्य बन गई है।कक्षा ५ तक प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया गया कि कम से कम कक्षा ५ तक सभी बच्चे स्कूल जाये और शिक्षा ग्रहण करें। इसलिए सर्व शिक्षा अभियान योजना शुरू की गई...जिसका स्लोगन है ....सब पढ़ें,सब बढ़ें। यहाँ तक तो सब ठीक है कि इस समस्या पर ध्यान दिया गया ,योजना बनाई गई लेकिन सवाल ये उठता है कि कोरी योजनायें बनाने से क्या होगा ??स्कूल में पढने के लिए बच्चे भी तो आने चाहिए। और ये एक बहुत बड़ी चुनौती है.....कि बच्चों को पढने के लिए कैसे प्रेरित किया जाये ??बच्चों का स्कूल आना बेहद जरूरी है इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए। इसी बात को ध्यान में रखते हुए केंद्र व राज्य सरकार ने एक योजना शुरू की..जिसका नाम है मिड-डे-मील यानि मध्यान भोजन। इस योजना का उद्द्येश्य है स्कूल में बच्चों की संख्या को बढ़ाना....सरकार का ऐसा मानना है कि यदि स्कूल में बच्चों को मुफ्त भोजन दिया जाये तो बच्चे पढने आएंगे। इसके लिए स्कूल में बाकायदा एक रसोई,एक कुक की व्यवस्था की गई और इस बात पर भी ध्यान देने को कहा गया कि बच्चों को दिया जाने वाला भोजन पौष्टिक और स्वच्छ होना चाहिए। शिक्षकों को भारी निर्देश भी दिए गए कि ये सारी व्यवस्था एकदम सुचारू रूप से चलनी चाहिए अन्यथा शिक्षक नप जायेंगे।
योजना लागू हुई विवादों के साथ आगे भी बढ़ी और आज भी चल रही है.....लेकिन सबसे बड़ा सवाल यहाँ यह उठता है कि क्या मिड-डे -मील योजना वास्तव में बच्चों के हित में है.. ?????क्या सिर्फ खाना बाँट देने से बच्चे स्कूल आते हैं.. ??अगर आते भी हैं तो क्या पढने आते हैं...????और क्या लाइन में खड़ा करके खाना बाँट कर हम उनको भीख नही दे रहे...????क्या हम बच्चों के अंदर का आत्मसम्मान खत्म नही कर रहे...???क्या मुफ्तखोरी की आदत नही डाल रहे उनमे....???प्राथमिक स्कूल में पढने वाले बच्चे खाने के लिए लाइन में लगे हुए ऐसे मालूम देते हैं, जैसे मानो किसी लंगर की लाइन में खड़े हों। बच्चे का मन एक कोरी स्लेट की तरह होता है जिसपर जो चाहो वो लिख दो। बच्चा वही सीखता है जो वह देखता है और अनुभव करता है। जब उसे बिना कुछ किए ही खाने की आदत पड़ जाएगी फिर क्या होगा???कक्षा ५ के बाद मिड-डे -मील कहाँ से आयेगा..??क्या ये नन्हे-मुन्हों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है ???ऐसे बहुत सारे सवाल हैं। जिनका उत्तर अभी किसी की समझ में नहीं आ रहा है...लेकिन इसके दूरगामी परिणाम हमें एक दिन जरूर दिखाई देंगे। बच्चों को भोजन देने की बात ठीक है लेकिन मुफ्त में नहीं ,अगर उनको खाना देना ही है तो उसके बदले में उनसे श्रम करवाया जाना चाहिए कोई भी ऐसा काम जो उनके स्तर का हो,जैसे-फुलवारी में काम कराना,कक्षाओं को साफ़ रखना,स्कूल की साफ़-सफाई का ध्यान रखना,खाना बनवाने में मदद करना आदि। जिसके बदले में उन्हें खाना दिया जाये तो उनके अंदर का आत्मसम्मान मरना नही चाहिए बल्कि उन्हें ऐसा लगे कि हमने कुछ काम किया है तब उसके बदले में हमें रोटी मिली है। मुफ्त में खाना बांटने से बच्चों का भविष्य बिगाड़ रहें हैं हम। इसके साथ ही न तो बच्चों को अच्छा साफ़-सुथरा और पौष्टिक भोजन ही मिल पाता है। खाने के नाम पर सिर्फ खाना-पूरी हो रही है ये तो सभी अच्छे से जानते हैं और देख रहे हैं ।
बच्चे हमारे देश का सुनहरा मुस्तकबिल हैं। उनके ही नाजुक कंधो पर देश भार है। ये कंधे इतने मजबूत होने चाहिए कि अपने देश के भविष्य को संभाल सकें। मेहनत और आत्मसम्मान के साथ कमाई हुई रोटी को निवाला बना सकें।
पूजा सिंह आदर्श

Saturday, 17 September 2011

अपने बच्चे को मौत नहीं,जिन्दगी दीजिये.....

तेज रफ़्तार आज के दौर की पहचान बन चुकी है। धीमे चलने वालों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है, न ही उनकी कोई क़द्र है। और तेज़ रफ़्तार को ही अपनी जिन्दगी बनाने वाले कोई और नहीं है बल्कि आज के युवा हैं.....युवाओं की जिन्दगी बन चुकी है...तेज़ रफ़्तार ....जिसकी उन्हें नशे की तरह इस कदर आदत पड़ चुकी है..कि इस नशे के बिना सुकून नहीं मिलता। युवाओं के लिए ये नशा है... मोटरबाइक पर फर्राटे के साथ उड़ान भरने का और हवा के साथ बातें करने का। आजकल युवाओं सर पर एक अजीब सा भूत सवार है......अपनी बाइक को इतना तेज़ दौड़ाने का,,कि अपनी अनमोल जिन्दगी को भी दावं पर लगाने से नहीं चूकते। उन्हें इस बात का जरा भी अहसास नही कि तेज़ रफ़्तार से सड़कों पर दौड़ने वाली ये बाइक उनकी जरा सी लापरवाही के कारण उन्हें मौत के मुंह में भी धकेल सकती है। जैसा कि अभी पूर्व क्रिकेटर अजहरुद्दीन के साथ हुआ,बाइक पर सवार उनके जवान और होनहार बेटे अयाजुद्दीन की ऐसी ही एक सड़क दुर्घटना में दर्दनाक मौत हो गई। उनके साथ उनका एक फुफेरा भाई भी इस घटना में मौत का शिकार हुआ। किसी भी परिवार में एक साथ दो-दो जवान मौत का हो जाना किसी कहर से कम नहीं है और किसी भी इंसान को अंदर तक तोड़ देने के लिए काफी है। ये वो दर्द है जिसकी टीस जिन्दगी भर तक उठेगी।
लेकिन ये क्यों हुआ ????क्या ये जानना जरूरी नहीं है ???बिल्कुल है ....माता-पिता अपने बच्चे को लाड में आकर बाइक का वो तोहफा दे देते हैं जो शायद उनकी मौत की वजह बन जाता है।माँ-बाप ने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा होता कि अपने बच्चे जो तोहफा वो लाकर दे रहे हैं वो उनसे उनका बच्चा ही छीन लेगा???आजकल बच्चा १६-१७ साल का हुआ नही कि उसे चलाने के लिए मोटरबाइक चाहिए। बाइक पर चलना फैशन के साथ-साथ एक स्टेटस सिम्बल बन गया है। लड़के सोचते हैं कि १०वी पास करते ही माँ-बाप उन्हें बाइक दिलवा दें,जिससे उनके दोस्तों के बीच उनका रुतबा और बढ़ जाये...बाइक लेने के साथ ही इन युवाओं का एक और शौक भी परवान चड़ता
है और वो है....मोटरबाइक के साथ खतरनाक करतब दिखाना यानि स्टंटबाज़ी करना। इस शौक का जुनून इस कदर है कि इन्हें अपनी जान तक की कोई परवाह नहीं होती।
इनदिनों बाज़ार में तरह-तरह की मोटरबाइक से पूरा बाज़ार पटा हुआ है......५० हज़ार रु तक से लेकर १५ लाख रु तक की बाइक बाज़ार में उपलब्द है । जिसमे पावर इंजन,पावर ब्रेक,हाई स्पीड और न जाने कितनी खूबियाँ हैं। जो लड़कों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं।एक से एक बढिया और खूबसूरत बाइक बाज़ार में मौजूद है। जिसे देखते ही किसी भी बाइक शौक़ीन का दिल ललचा जाए। बाइक चलाने के शौक़ीन युवा ग्रुप बनाकर रात में सुनसान सड़कों पे रेस लगाने निकलते हैं। और यही सुनसान सड़के बनती है उनके स्टंट दिखाने की जगह। और कभी-कभी यही सड़के इनकी जान की दुश्मन बन जाती हैं और निगल जाती है कई मासूम जिन्दिगियाँ । अपने जरा से शौक और जुनून को पूरा करने के लिए लोग अपनी जिन्दगी तक की परवाह नहीं करते। यहाँ कहने का ये मतलब बिल्कुल भी नही है कि बाइक हमेशा ही खतरनाक होती है...हमारे देश में अगर दुपहिया वाहन की बात करे तो बाइक लोगो की पहली पसंद है ....लाखों लोग रोज़ बाइक पर सफ़र करते हैं...अगर सावधानीपूर्वक चलते हैं तो जान बच जाती है और सही सलामत घर पहुँच जाते हैं...और अगर जरा सी भी लापरवाही हुई तो सीधे अस्पताल या फिर शमशान ही पहुँचते हैं।सड़क दुर्घटनाओं की अगर बात करे तो रोज़ कई लोग इसमें अपनी जान गवां देते हैं। आंकड़े बताते हैं कि सड़क दुर्घटना में मरने वालो की संख्या दुपहिया वाहन वालो की ज्यादा होती है। क्योकि तेज़ स्पीड में अगर ब्रेक लगाये तो संतुलन बिगड़ना लाज़मी है।
अपने बच्चों को तो बाइक का चस्का बिल्कुल न लगने दें। उन्हें इतनी समझ होनी ही चाहिए कि क्या अच्छा है और क्या बुरा। अपने बच्चे को,जिगर के टुकड़े को जिन्दगी दे न कि मौत का सामान। नहीं तो जिन्दगी भर का दुःख उठाना पड़ सकता है । जिसकी भरपाई नामुमकिन है। अगर कुछ बचता है तो वो है आँखों में पानी.....और कभी न भरने वाला जख्म....
पूजा सिंह आदर्श

Sunday, 8 May 2011

मदर्स डे पर विशेष:माँ की खिदमत ही इबादत है.....


माँ......नाम है एक खूबसूरत एहसास का,माँ...जिसमे समाई है पूरी दुनिया। जिसकी तुलना इस जहाँ में किसी और से नहीं की जा सकती। माँ के बारे में क्या लिखूं???? कहाँ से शुरू करूँ ,कुछ समझ में नहीं आता। हमारा जन्म ही जिसके अंश से हुआ हो,जिसने अपने खून से हमें सींचा हो,९ महीने हमें अपने अंदर छुपा कर रखा हो,अपने निवाले से पहले हमें खिलाया हो,हमें बोलना सिखाया हो,ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया हो,हमारी बीमारी में,हमारी परेशानी में चिंता की सबसे ज्यादा लकीरे जिसके माथे पर आई हो,हमारी हर छोटी-बड़ी जरुरत का ध्यान रखा हो और बदले में अपने बच्चों से कभी कुछ नहीं माँगा और न कभी कोई उम्मीद की। उसके बारें में क्या लिखूं जो बस देना जानती है,त्याग करना जानती है। बच्चों की मुस्कान के साथ जिसकी मुस्कान और तकलीफ के साथ तकलीफ जुडी हो....उस माँ के बारें में लिखने से ज्यादा कोई कठिन कार्य नहीं है। माँ बच्चों के सबसे निकट होती है ,,इसलिए उनकी सबसे अच्छी दोस्त भी होती है।
८ मई को मदर्स डे मानते हैं हम....एक दिन माँ के नाम......अच्छा प्रचलन है है...होना भी चाहिए एक दिन माँ के लिए। जब साल के ३६४ दिन वो हम सब को देती है तो एक दिन उसे भी समर्पित होना चाहिए। इस दिन कुछ स्पेशल करतें हैं बच्चे माँ के लिए,उसके लिए कुछ खास बनातें हैं,उसे उपहार देते हैं,प्यार व मान-सम्मान देते हैं।
इस मदर्स डे पर मेरा मन उन लोगों के लिए लिखने को किया जो माँ-बच्चों के रिश्ते को ही भूल गए हैं। जो लोग अपने माता-पिता को ही भूल गए हैं जिन माँ-बाप ने उम्र भर सिर्फ अपने बच्चों के लिए ही किया,अपना सब कुछ उन्ही पर न्योछावर कर दिया और उसके बदले में बच्चों ने उन्हें घर से निकाल दिया या फिर उनसे अलग रहने लगे,उनसे कटने और बचने लगे। अपने माता-पिता के लिए समय नहीं है उनके पास। उस माँ के लिए समय नहीं है ,जिसके पास अपने बच्चों के लिए समय के अलावा और कुछ नहीं होता। एक माँ अपने चार बच्चों का ध्यान रख सकती है बिना किसी भेदभाव के,बिना किसी परेशानी के लेकिन चार बच्चे मिलकर एक माँ का ध्यान नहीं रख सकते। बुढ़ापे में उसे प्यार व समय नहीं दे सकते उसे दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर देते हैं। धिक्कार है ऐसी औलाद पर। दुनिया में बहुत से ऐसे माँ-बाप हैं जिन्हें अपने जीवन की सांध्य बेला में अपनों से बस उपेक्षा ही मिलती है और उन्हें किसी वृद्ध-आश्रम की शरण लेनी पड़ती है। ऐसे में मदर्स डे मनाना कितना उचित है ????
हम सभ्य समाज में रहते हुए खुद को सभ्य कहने का दावा करतें हैं। क्या वाकई हम सभ्य हैं ???विदेशों की नक़ल
करके अपने माँ-बाप को खुद से अलग कर देना,उन्हें किसी वृद्ध-आश्रम में भेज देना, ये न तो हमारी सभ्यता है और न ही हमारी संस्कृति। ऐसा विदेश में चलता है क्योंकि वहां की संस्कृति अलग है। वहां तो माँ-बाप ही बच्चों से इतने नहीं जुड़े होते तो बच्चे ही क्या जुड़ेंगे ??लेकिन हमारे यहं ऐसा करना सबसे बड़ा दुष्कृत्य है। इसके आलावा हम मदर्स डे के उपलक्ष्य में ये भी सन्देश देना चाहतें हैं कि जब माँ अपने किसी बच्चे में अंतर नहीं कर पाती,तो फिर बेटियों के साथ भेदभाव क्यों ?कन्या भ्रूण-हत्या जैसा जघन्य अपराध एक माँ कैसे कर सकती है?बेटियां होंगी तभी तो माँ होगी। जब बेटिओं का ही अस्तित्व मिटा दोगे तो ....मदर्स डे कहाँ से मनाओगे??बेटियों को भी जीने दीजिए उन्हें भी हक है... इस दुनिया में अपनी ऑंखें खोलने का।
माँ तो एक सुखद छाँव है,जिसके नीचे बच्चों को आसरा मिलता है। एक दिन माँ के नाम नहीं बल्कि अपनी तमाम जिन्दगी भी उसके नाम कर दे तो कम है। हर दिन उसका है,उसकी खिदमत में ही पूरी जिन्दगी बिता दें तो भी उसका क़र्ज़ नहीं चुका पाएंगे। माँ के क़दमों के नीचे जन्नत होती है,उसकी खिदमत खुदा की इबादत है। यही इबादत हमें जन्नत का रास्ता दिखाती है और माँ की दुआएं हमें बुलंदियों तक पहुँचाती है।माँ के बारें में जनाब मुनव्वर राना ने क्या खूब लिखा है कि .....
लबों पे उसके कभी बददुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फा नहीं होती।
पूजा सिंह आदर्श

Saturday, 7 May 2011

मेरी माँ...सा कोई नहीं......

रिश्ते तो और भी हैं हमारी हयात में
माँ..सा मगर नहीं है कोई कायनात में,
माँ ने हमें जन्म दिया,दुनिया में पहचान दी
ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया,
उसी ने हमें इंसान बनाया
गीले में सोकर हमें सूखे में सुलाया
अपना निवाला भी हमें खिलाया
अपने बच्चों के लिए वो सब सहती है
मगर मुहं से उफ़ तलक न कहती है
हर दुःख, हर तकलीफ वो उठाती है
क्या उसके प्यार में कोई कमी आती है
बच्चे तो उसके जिस्म का हिस्सा हैं
उनमे.. फर्क वो कहाँ कर पाती है
माँ के क़दमों के तले ही मेरी जन्नत है
उसकी खिदमत ही बस मेरी मन्नत है
माँ की गोद से बढ़कर कोई मखमल नहीं
उसकी मुस्कान से सुंदर कोई फूल नहीं
मेरी माँ की दुआओं का ताबीज साथ रहता है
हर मुसीबत से वो मेरी हिफाज़त करता है
माँ...... की जगह ले पाया है कौन ??
उसका क़र्ज़ अदा कर पाया है कौन ??
माँ...... हम कर्जदार हैं तेरे ये क़र्ज़ न उतरेगा
लेकिन माँ की खिदमत का सबाब जरूर मिलेगा।
पूजा सिंह आदर्श

Friday, 6 May 2011

दि मोस्ट वांटेड: अभी जिन्दा है दुनिया का सबसे खतरनाक शख्स....


लादेन मारा गया,आख़िरकार अमेरिका ने उसकी मौत पर अपनी मोहर लगा दी। जहाँ वो छिपा हुआ था मौत भी उसे वहीँ मिली। पाकिस्तान की सरजमीं जो उसकी पनाहगाह थी,उसकी कब्रगाह भी बनी।उसकी मौत के साथ आतंकवाद से जुड़ा एक अध्याय ख़त्म हो गया। लेकिन लादेन की मौत के बाद उठा सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या उसकी मौत के बाद दुनिया महफूज़ हो गई है????क्या अब आतंकवाद,दहशतगर्दी से हमें छुटकारा मिल गया है???? तो इस सवाल का जवाब सुनने के लिए तैयार रहिये.....और जवाब है.. नहीं..हम आज भी महफूज़ नहीं हैं क्योंकि अभी जिन्दा है वो शख्स जिसे अल्बर्ट किंग ने दुनिया का सबसे खतरनाक शख्स कहा है। उसके सर पे भी दहशतगर्दी का इलज़ाम है। वो भी दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी संगठनों में से एक लश्कर-ऐ -तएबा की सर परस्ती करता है, उसके सर पर भी हजारों का खून है। वो भी अमेरिका से मुहरबंद अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी है। लेकिन वो ओसामा बिन लादेन की तरह कहीं छिपकर नहीं रहता,उसकी तलाश में सैकड़ों सेटेलाइट और ड्रोन आसमान में नहीं मंडराते। वो करांची के शानदार महलनुमा घर में रहता है,आलिशान पार्टियों की मेजबानी करता है। उसकी दावत में न्योते के इंतजार में पाकिस्तान के तमाम जनरल और नेता रहते हैं। जी हाँ.....ये शख्स है... "दाउद इब्राहिम"। जो अपने जुर्म और दहशत के निजाम को एक कम्पनी की तरह चलाता है-डी-कम्पनी।
ओसामा बिन लादेन को पनाह देने वाला,तमाम आतंकवादी अभियानों का फाईनेंसेर ,परमाणु हथियारों का सौदागर,युवा पीढ़ी की नसों में नशे का ज़हर घोलने वाला। देश के गृह-मंत्री पी.चिदम्बरम यह कह सकतें हैं कि हम अमेरिका की तरह दाउद को निशाना नहीं बना सकते,उनकी कोई मजबूरी होगी लेकिन हिन्दुस्तानी आवाम की कोई मजबूरी नहीं है। लादेन के मारे जाने के बाद हर हिन्दुस्तानी के दिल से यही आवाज़ आ रही कि ...बस हमें दाउद ला दो जिन्दा या मुर्दा...... । १९९३ में मुंबई बम कांड में जो लोग इसकी दहशतगर्दी का शिकार हुए और उसके बाद २६ नवम्बर २००८ को मुंबई हमले में जो लोग मारे गए उनके घरवालों के दिलों से तो यही आवाज़ निकल रही है कि जो हाल लादेन का हुआ वही दाउद का भी होना चाहिए। आइये एक नज़र डालतें हैं उसके काले कारनामों पर-
१-१९९३ में मुंबई बम-कांड-२५७ लोग मारे गए।
२-१९९० में अफगानिस्तान गया,और लादेन से मिला।
३-अलकायदा के साथ गठजोड़ ,अमेरिका ने ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित किया।
४-२००८ में गैंग को लश्कर-ऐ-तैयबा से से जोड़ लिया।
५-अलकायदा के टेरर नेटवर्क को हवाला और हथियारों की सपोर्ट।
६-२००१ में गुजरात में आतंकी घटनाओ के लिए फंडिंग।
७-१९९३ के बाद मुंबई की हर आतंकी घटना में डी-कम्पनी का सहयोग।
८-लश्कर के नौसैनिक विंग की पूरी देखरेख दाउद के हाथ में तथा उसी ने २६/११ की घटना को अंजाम दिया।
ये तो है उसके काले कारनामों का चिठ्ठा जो कुछ उसने अब तक किया है जिससे उसे ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित किया गया । इसके आलावा उसका मेन बिजनेस जिसके बल पर वो करता राज.... अकेले मुंबई में डी कम्पनी का अरबों डालर का टर्नओवर है। रिअल ऐस्टेट,हवाला,ड्रग्स,कांट्रेक्ट किलिंग,सट्टा,फ्लैश,ट्रेड में उसका एक छत्र राज चलता है। अफगानिस्तान से ड्रग्स का कच्चा माल दुनिया भर के माफिया तक पहुँचाने की सप्लाई चेन पर भी दाउद का कब्ज़ा है। अमेरिका और यूरोप में अरबों डालर की सम्पत्ति डी कम्पनी के पास है। इसके अलावा बॉलीवुड में भी डी कम्पनी का अच्छा -खासा दखल है। वो यहाँ पैसा लगाने के साथ-साथ नई रीलिज़ में हिस्सा भी लेता है.. यहाँ उसके टेरर हर कोई वाकिफ है। आई.एस.आई का वो खास आदमी है। इसकी मदद से ही वो देश में गुस सके। १९९३ में धमाकों के बाद दाउद आई.एस.आई की मदद से ही दुबई पहुंचा और उसके बाद करांची। तब से वो लगातार यहीं रह रहा है।
अब इतने खतरनाक इन्सान का इस तरह खुला घूमना क्या उन लोगों के साथ गद्दारी नहीं है... जो अपने ही देश में शहीद हुए,आतंकवाद का शिकार हुए। लादेन तो मारा गया अब दाउद क्या करना है या उसका क्या होगा ? ये देखने वाली बात है। वैसे ओसामा की मौत के बाद उसके साम्राज्य की नीव तो हिल गई होगी। अब वो भी जल्द ही पाकिस्तान से बाहर भागने की फिराक में होगा। पाकिस्तान तो हर जुर्म ,हर गुनाह की पनाहगाह है। पाप का घड़ा भर के छलक तो काफी समय से रहा है लेकिन अब इसके फूटने की नौबत आ गई है और इंशाल्लाह वो दिन दूर नहीं जब इन दरिंदो की पनाहगाह ही इनकी कब्रगाह बनेगी।
पूजा सिंह आदर्श

Wednesday, 27 April 2011

सांप्रदायिक दंगे.....इंसानियत पर सवालिया निशान????


हिन्दू दिखाई दे न मुसलमाँ दिखाई दे
आँखे तरस रही है कि इंसा दिखाई दे।
क्या जिंदगी है नाम इसी का ज़माने में
हर शख्स जिन्दगी से गुजरा दिखाई दे।
धर्म -जात,साम्प्रदायिकता विशेष पहचान है हमारे देश की और इनकी खातिर इंसानियत का दुश्मन बन जाना हमारा अधिकार भी है और कर्त्तव्य भी। जब देश में कोई आतंकी हमला हो या फिर हमारे पड़ोस में कोई चोर बदमाश गुसकर कोई वारदात कर जाए तो कोई भी खुदा या ईश्वर का बन्दा आपकी मदद करने या आपके हक में बोलने के लिए खड़ा नहीं होगा और एकजुट होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि उसे देश से या आपसे मतलब ही क्या है??ईश्वर या खुदा यहाँ मैंने अलग-अलग इसलिए लिखा है कि हमारे देश के ९०% लोग इन्हें अलग ही समझते हैं केवल १०% लोग ही अपनी सोच को बदल पाए हैं,उसमे खुलापन ला पाए हैं कि हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई सब एक ही परमात्मा की संतान हैं। बाकी तो सबके अलग-अलग भगवन हैं।
धर्म-संप्रदाय के नाम पर तो सब मर मिटने को या मरने-मारने को तैयार हो जातें हैं लेकिन जरा ये कह कर तो देखिये कि सीमा पर जरुरत है आपकी.....तो एक भी आवाज़ नहीं निकलेगी। कहने का मतलब ये है कि हम चाहे कितना भी पढ़-लिख जाएँ ,कितनी भी तरक्की कर लें ,लेकिन हम आज भी गुलाम है,बेड़ियों में जकड़े हुए हैं। ये बेड़ियाँ हैं साम्प्रदायिकता की ,जातिवाद की। हमें अंग्रेजों की ग़ुलामी से आज़ादी तो मिल गई लेकिन इनकी दासता से मुक्ति पता नहीं कब मिलेगी??यदि हम साम्प्रदायिकता के गुलाम न होते तो जो तीन दिन पहले मेरठ में हुआ वो न होता। हुआ ये कि कुछ गैर मुस्लिम उपद्रवी तत्वों ने मस्जिद में घुसकर वहां के इमाम से अभद्रता की,मारपीट की,और धर्मग्रन्थ को भी नुकसान पहुँचाया बस फिर क्या था बवाल तो होना ही था।लोग इकट्ठे होकर सड़कों पर उतार आये और देखते ही देखते ये घटना हिन्दू-मुस्लिम दंगे में तब्दील हो गई। मेरठ वही जगह है जहाँ से अमर शहीद मंगल पाण्डेय ने १८५७ में आज़ादी की लड़ाई का बिगुल बजाया था। ऐसी पावन धरती को न जाने क्यों बार-बार अपनी परीक्षा देनी पड़ती है।
मेरठ सांप्रदायिक मामलो में पहले से ही काफी संवेदनशील रहा है। यहाँ हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़कने का इतिहास पुराना है। इस बार भी ऐसा ही हुआ देखते ही देखते पूरा शहर सुलग उठा। चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल,आगजनी,पथराव,भगदड़ और पुलिस की फायरिंग। बसों में आग लगा दी,तीन पुलिस चौकियां फूँक दीं,दुपहिया वाहनों में आग लगाई,कई पुलिस वाले जख्मी हुए। गनीमत ये रही कि कोई हताहत नहीं हुआ। पूरा इलाका छावनी में बदल गया। स्कूल कॉलेज बंद कर दिए गए।
मेरठ में इन दिनों ऐतिहासिक नौचंदी मेला अपने पूरे शबाब पर है और उस रात को भी मेले में भीड़ अपने चरम पर थी। जैसे ही शहर में दंगा होने की खबर फैली मेले में भगदड़ मच गई, लोग अपने घरों की तरफ भागने लगे क्योकि जहाँ दंगा हुआ वो जगह मेले के पास ही है। पुलिस ने बड़ी मुश्किल से भीड़ को काबू में किया तब जाकर स्तिथि नियंत्रण में हो पाई वरना कितना बड़ा हादसा हो सकता था,कितने बेक़सूर लोग मारे जाते। लेकिन इस सब से इन लोगो को क्या सरोकार जो देश की शांति भंग करना चाहतें हैं.जो ये नहीं चाहते कि देश में अमन-चैन कायम रहे। उनका तो मकसद ही ये है कि पहले तो दंगा भड़का दो फिर उसे राजनैतिक रंग दे दो। जान माल का नुकसान हो जाने के बाद शुरू होता है आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला। गाज गिरती है पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों पर । या तो इनका तबादला कर दिया जाता है या जिसकी ज्यादा किस्मत ख़राब हो उसे सस्पेंड। हर हाल में दोषी अफसर ही पाए जातें हैं। अब ये लोग तो गए नहीं थे दंगाइयों को दावत देने कि आओ और लगा दो आग शहर को। इनके पीछे जो असली चेहरें हैं उन्हें बेनकाब कोई नहीं करना चाहता क्योंकि जो ये सब कर रहें हैं उसमे इन लोगों का अपना फ़ायदा है।
राजनेताओं से,शहर के मेयर से,आला अफसरों से क्या उम्मीद की जा सकती है???ये बेचारे तो खुद ही इतने व्यस्त हैं कि इनके पास आम जनता के लिए समय ही नहीं है....न समय है,न नीयत है। हमें आदत पड़ गई है बात-बात पर इनके तलवे चाटने की। इनका इलाज तो ये है कि इनके किसी सड़े हुए अंग की तरह काट फेंकों तभी इन्हें अपनी असली औकात पता चलेगी। हमें ही समझना होगा...अपने आप को और अपनी सोच को बदलना होगा कि सब धर्म सामान है,उनके साथ न तो किसी किस्म की अभद्रता स्वयं करे और न दूसरों को करने दे।जिस प्रकार हमें अपना धर्म प्रिय है उतना ही सम्मान आप दूसरें धर्म को भी दें।दूसरे धर्म का अपमान बर्दाश्त करना मानवता नहीं है। यदि किसी ने कोई ऐसी शर्मनाक हरकत की है तो उसकी शिकायत पुलिस-प्रशासन से करें न कि भावनाओं में बहकर दंगा -फसाद करें। अरे.... धर्म-जात तो बाद में है सबसे पहले तो हम इन्सान हैं,,,,हम सब भारतीय हैं.लड़ाई झगडे से तो अपनों को ही नुकसान पहुंचा रहे हो......बस एक बार अपनी अंतरात्मा से पूछ कर देखो कि जिन घरों में आग लगा रहे हो.... क्या वो आपके अपने नहीं हैं?????????मुट्ठी भर स्वार्थी लोगों के बहकावे में आकर अपनों का घर मत जलाइए।
इस घटना पर मुझे अपने ही शहर में अपनों का दंश झेल चुके डा.बशीर बद्र का एक शेर याद आता है कि.....
लोग टूट जातें हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
पूजा सिंह आदर्श

Thursday, 21 April 2011

फीकी पड़ती जा रही ज़री कारीगरी की चमक......


हमारे देश में बहुत सी जगह ऐसी हैं जिनकी पहचान या तो वहां पैदा होने वाली चीजों से होती है या फिर वहां के उद्दयोग -धंधो से। जैसे-लखनऊ अपनी चिकिनकारी,अलीगढ अपने ताला उद्दयोग,मेरठ कैंची व खेल का सामान बनाने के लिए,मुरादाबाद पीतल उद्दयोग के लिए विश्व-प्रसिद्ध है ठीक वैसे ही उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शहर बरेली जो बांस-बरेली के नाम से भी जाना जाता है अपने ज़री-ज़रदोज़ी के काम के लिए भी शुरू से ही जाना जाता है। वैसे तो बरेली में और भी उद्दयोग धंधे हैं जिनके लिए बरेली विश्व-प्रसिद्ध है...आइये एक नजर इन् पर भी डालते हैं-बांस(केन)उद्दयोग,इमारती लकड़ी से बना फर्नीचर उद्दयोग,पतंग व मांझा उद्दयोग और बेहद प्रसिद्ध आँखों में डाले जाने वाला सुरमा। इन सबके ऊपर बरेली की असली पहचान है यहाँ की परंपरागत ज़री-ज़रदोज़ी...जिसके कारण ही बरेली को नाम दिया गया ज़री नगरी। ज़री के काम की खासियत ये होती है कि ये काम हाथ से किया जाता है,इसमें किसी भी तरह की मशीन का कोई इस्तेमाल नहीं होता है। हाथ से किया गया ये काम इतना बारीक़ और खूबसूरत होता है कि कोई भी इसकी तारीफ किए बिना नहीं रह सकता। हाथ से की गई इस कारीगरी में एक डिजाइन को पूरा करने में कई-कई दिन लग जाते हैं। लकड़ी का अड्डा(फ्रेम)बनाकर उसमे सलमा-सितारे,कटदाना,कसब,नलकी,मोती,स्टोन आदि बड़ी सफाई टांके जाते है। जितने कम दामो पर इसका मैटीरीयल आता है और जितने कम मेहनताने पर ये तैयार हो जाता है और उतनी ही ऊँची कीमत पर डीलर व दुकानदार ग्राहकों को बेचतें हैं। हाथ की इतनी सफाई व आकर्षक कसीदाकारी देखकर ग्राहक मुहं मांगे दाम देकर खरीदता है। मिसाल के तौर पे अगर कोई परिधान १००० में तैयार होता है तो दुकानदार इसे दुगने दाम में बेचकर डबल मुनाफा कमाता है। लेकिन यहाँ यह सब लिखने का क्या तात्पर्य है.....ज़री कारीगर को इस मुनाफे से क्या मिलता है?कुछ नहीं ....इस लिए ये हुनर धीरे-धीरे कम होता जा रहा है । मेहनत ज्यादा और मजदूरी कम इस बात ने कारीगरों के हौसले को तोडना शुरू कर दिया है अब वे इस काम को करने में रूचि नहीं दिखा रहे हैं। जो कम उन्हें दो वक़्त की रोटी ठीक से नहीं दे पा रहा हो उसे करने से क्या फ़ायदा है। इसलिए ये लोग अपने लिए दूसरा रोज़गार तलाशने लगे हैं। लेकिन उनके पास रोज़गार का कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं है। बारीक़ सुई पकड़ने के आदि हाथ कोई दूसरा औजार कैसे पकड़ सकते हैं। ज़री कारीगर ये रोज़गार अपनी ख़ुशी से छोड़ने को तैयार नहीं है। अगर उन्हें भी अपनी मेहनत की अच्छी मजदूरी मिले तो वे इस खूबसूरत कला को आगे कई वर्षों तक चला सकतें हैं। इस कला के सामने एक समस्या और भी है कि भावी पीढ़ी इसमें कोई रूचि नहीं दिखा रही है इनका मानना है कि जो काम हमारे बाप-दादा ने किया बस उतना ही काफी है। इस रोज़गार ने उनका ही क्या भला किया ????इसमें हमारा कोई भविष्य नहीं है। पुराने कारीगरों के बच्चे अपने पुश्तैनी काम से दूर होते जा रहे हैं,जिससे ज़री कारीगरी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
कुछ अपनों की उपेक्षा,कुछ सरकार की उपेक्षा ने इन हुनरमंदों का मनोबल तोड़ सा दिया है। मुग़ल काल में नूर जहाँ ने जिस कला को प्रोत्साहन देकर उसे आज तक जिन्दा रखा ,,आज सरकार उसकी अनदेखी कर उसे लुप्त होने पर विवश कर रही है। बदलते फैशन के इस युग में चाहे कितनी भी क्रांति क्यों न आ जाए लेकिन ज़री-ज़रदोज़ी के बिना फैशन पूरा नहीं होता। ज़री कारीगरों का अस्तित्व बचाने के लिए जरूरी है कि इन कारीगरों को बचाया जाए तभी हम इस नायाब कला को सहेज कर रख पाएंगे।
पूजा सिंह आदर्श

Thursday, 24 March 2011

घी हमेशा टेढ़ी ऊँगली से ही निकलता है.....

जीवन एक सपूर्ण पाठशाला है...इस बात से हम और आप इंकार नहीं कर सकते क्योकि इस पाठशाला में हमें रोज कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। जिन्दगी आपको हर रोज एक नया अनुभव कराती है,,जो आगे चलकर आपके जीवन में कही न कहीं काम आ सकता है। ऐसा ही एक अनुभव आज हमने भी किया जो हमें जिन्दगी भर याद रहेगा। दरअसल हुआ कुछ यूँ कि....हमने एक सरकारी नौकरी के लिए आवेदन पत्र भरा जिसके लिए मुख्य चिकित्साधिकारी के द्वारा एक फिटनेस प्रमाण-पत्र बनवाना जरूरी था और इसे बनवाने के लिए हम जा पुहंचे जिला चिकित्सालय जहाँ पहुँचते ही हमारी रूह फ़ना हो गई.... देखा कि बेरोजगारों की इतनी भीड़ जमा है जो अपना फिटनेस प्रमाण -पत्र बनवाने आये हैं। एक बार को तो लगा कि भैया निकल लो यहाँ से.... यहाँ कुछ नहीं होने वाला...लेकिन फिर अपने आप को दिलासा दी और खुद का हौसला बढाया कि ऐसे हिम्मत हारने से तो काम नहीं चलेगा। फिर लोगो से पूछते-पाछते परचा बनवाया और लग गए खुद को फिट साबित करवाने की लाइन में...भीड़ को चीरते हुए आखिर हम डाक्टर साहब तक पहुँच ही गए और लगवा लिया ठप्पा अपने पर्चे पर कि हम बिल्कुल स्वस्थ हैं। इसके बाद दूसरा पड़ाव था... नेत्र विभाग में जाँच करवाने का लेकिन .... थोड़े से कष्ट के बाद हमने इस पड़ाव को भी पार कर लिया। आगे की डगर थोड़ी, नहीं बहुत कठिन थी जहाँ करानी थी अपनी नाप-तोल...वहां का द्रश्य देखने के बाद अच्छे -अच्छों की हिम्मत न हो कि उस जगह घुस पाए। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि उसे नियंत्रित करने के लिए पुलिस फोर्स बुलानी पड़ी और लड़के-लड़किओं की अलग-अलग लाइन बनवा दी गई। जैसे-तैसे करके हम भी लाइन में लग गए। धक्का-मुक्की ,नोक-झोंक के बीच लाइन रेंग-रेंग कर खिसक रही थी,लग रहा था कि मानो जस की तस है लाइन....जैसे जैसे हमें अपनी मंजिल करीब आती दिखी थोड़ी तस्सली मिली कि अब हमारा काम बन जायेगा लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि अगले ही पल क्या होगा ये नहीं कहा जा सकता????शायद हमने भी नहीं सोचा था कि हमें भी कुछ ऐसा करना पड़ जायेगा। हुआ कुछ यूँ कि जब लाइन आगे बढ रही थी इसी बीच देखा कि एक-दो सिफारशी लोगों ने अपने जानने वालो को अंदर भेज दिया वहां सुबह से लाइन में कड़ी लड़किओं ने शोर मचाना शुरू कर दिया,देखा तो मैंने भी था लेकिन नजरंदाज़ कर दिया और लड़किओं को भी शांत रहने को कहा लेकिन सब्र का बांध तब टूटा जब एक वर्दी धारी को अपनी वर्दी का फ़ायदा उठाते हुए देखा,उसने अपनी रिश्तेदार को चुपके से अंदर भेज दिया जब हमने इसका विरोध तो उसने बदतमीज़ी करनी शुरू कर दी.... फिर क्या था ???उसकी इस हरकत ने हमें अपना आपा खोने पर मजबूर कर दिया क्योंकि वर्दी वालों को कुछ गलत करते देख बर्दाश्त नहीं होता ....उसे सबक सिखाना जरूरी था।इस लिए हमने चढ़ाई अपनी आस्तीने और कूद गए मैदान-ऐ-जुंग में। इसके लिए मुझे न चाहते हुए भी अपने फ़ोन को कष्ट देना पड़ा और उसकी शिकायत उसके सिनिअर अफसर से करनी पड़ी। वहां इस बात को लेकर हंगामा खड़ा हो गया सभी ने मेरा साथ दिया। उस वर्दी धारी के तो जैसे होश ही उड़ गए। उसे भी लगा तो होगा कि उसने किस मुसीबत को को न्यौता दे दिया। जब उसे लगा कि बेटा तू गलत फँस गया तो वहां से खसक लिया। तब कहीं जाकर वहां कड़ी लड़किओं को शांति मिली और मुझे भी इसका फ़ायदा यह हुआ कि उसके बाद बस लड़किओं का ही नंबर आया। ऐसा करना या वहां कोई हंगामा करना मेरा मकसद नहीं था लेकिन हालात ने मजबूर कर दिया। इसके बाद मेरी आत्मा को जो संतोष मिला उसका कोई मोल नहीं है।
यहाँ ये सब लिखने का मेरा सिर्फ ये मकसद है कि अपने देश को आदत पड़ चुकी है टेढ़ी ऊँगली से घी निकलवाने की..जब तक आप सीधे बने रहो तब तक हर कोई आपको कुचल कर आगे बढ जाना चाहता है लेकिन जहाँ आपने अपनी आँखें टेढ़ी की वही सब सीधे हो जातें हैं। लड़किओं को कमजोर समझने की भूल करने वालों को को हम बता देना चाहतें हैं की बदल लें अपनी सोच इसी में समझदारी है वरना इसी तरह मुंह की खानी पड़ेगी। और थोड़ी सी मेहरबानी करें अपने देश पर कि उसे और कलंकित न करे इस तरह की शर्मनाक हरकत करके।
पूजा सिंह आदर्श

Monday, 21 March 2011

मेरे प्यारे मित्रों,,,,,,,पाठकों और उन सभी लोगों को जो मेरे लेखों को पढ़ना पसंद करतें हैं और मेरी हौसलाअफजाई करतें हैं ......उन सभी सम्मानित व्यक्तियों को मेरा सादर प्रणाम....आप सभी लोग यह सोच रहें होंगे की पता नहीं ये मोहतरमा न जाने कहाँ गायब हो गई.....काफी लम्बे समय से इनका कोई अता-पता नहीं है....वैसे मेरे लिखने या न लिखने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि लिखने वालों की कोई कमी नहीं है फिर भला मुझ जैसे लेखक की किसी को याद क्यों आने लगी????खैर मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योकि हम दूसरों के लिए नहीं बल्कि अपनी ख़ुशी और संतुष्टि के लिए लिखतें हैं। कुछ व्यक्तिगत कारणों से मुझे अपनी लेखनी को एक अल्पविराम देना पड़ा था लेकिन अब मैंने इसे वापस गति देने की ठान ली है और अब मेरी कोशिश रहेगी कि इसे कभी विराम न देना पड़े। इतने दिनों से कुछ नहीं लिखा, इस बीच काफी सारे मुद्दे निकल गए जिनपर चाहकर भी कुछ नहीं लिख पाए कभी-कभी इन्सान इतना मजबूर हो जाता है कि चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाता। चलिए जाने देतें हैं इन बातों.....पिछले दिनों जापान में जो कुछ भी हुआ....प्रकृति ने जो विनाश लीला वहां मचाई उस के आगे हम सब बेबस होकर बस प्रार्थना ही कर सकतें हैं कि ईश्वर उन्हें फिर सम्भलने का हौंसला दे...और जिन्होंने अपनों को खो दिया उन्हें इस दुःख से उबरने कि हिम्मत दे। प्रकृति के आगे इन्सान बेबस है,उसके आगे घुटने टेकने के आलावा हम कुछ नहीं कर सकते।जापान जैसी हालात कभी भी किसी की न हो ऐसी ऊपर वाले से दुआ करतें हैं। इस दुआ के साथ......आप सब के साथ हमेशा और लगातार बने रहने की मेरी भी कोशिश रहेगी.....और इसके लिए मुझे आप सब के प्यार,आशीर्वाद,सहयोग और समर्थन की जरुरत पड़ेगी.....मुझे पूरी उम्मीद है कि आप लोग इसमें कोई कमी नहीं रहने देंगे ...इसी आशा के साथ...
पूजा सिंह आदर्श

Wednesday, 22 September 2010

दबंग की दबंगई में दम है......भाई.....

बहुत दिनों से किसी फिल्म के बारे में कुछ नहीं लिखा,क्योंकि काफी टाइम से कोई फिल्म देखी भी नहीं थी,अभी ३-४ दिन पहले सलमान खान की दबंग देखी,फिल्म मुझे पसंद आयी और फिर सोचा कि अपनी लेखनी को इस तरफ मोड़ा जाए।कोई भी फिल्म जल्दी से मुझे इम्प्रेस नहीं करती है पर इस फिल्म ने ताजगी का अहसास कराया।सलमान का फ्रेश लुक ,सोनाक्षी का ताजगी और मासूमियत भरा चेहरा.....सलमान की दबंग फिल्म रिलीज हो के हिट भी हो गई...ईद-उल-फितर के मौके पर रिलीज़ होने के कारण और इसके आस-पास कोई फिल्म रिलीज़ न होने के कारण इसे भरपूर फ़ायदा मिला ....बहरहाल कारण जो भी हो पर फिल्म तो हिट है और सलमान भाई के खाते में एक और सुपरहिट फिल्म का इजाफा हो गया.....अब दबंग की तूती बोल रही है और बोले भी क्यों न....आखिर उनकी दबंगई में तगड़ा दम है भाई। कसा हुआ और एकदम फिट शरीर...उस पर स्टायलिश मूंछे...जो इंस्पेक्टर चुलबुल पाण्डेय यानि सलमान की पर्सनालिटी को एकदम सूट कर रही हैं...उसपर काला चश्मा और उसे बड़े स्टाइल के साथ पीछे शर्ट के कॉलर पर लगाना...और फ़ॉर्मल कपड़ों का मतलब सिम्पल पैंट-शर्ट का क्या गज़ब कॉम्बीनेशन पहना है पाण्डेय जी ने....क्या लगे हैं सलमान इस फिल्म में,वैसे सलमान की फ़िल्में देखने का मुझे कोई खास शौक नहीं है। सच बात बताऊँ तो मैंने ये फिल्म सोनाक्षी सिन्हा की वजह से देखी..चलिए उनकी बात बाद में करेंगे पर फिल्म में सलमान ने मुझे काफी इम्प्रेस कर दिया,ये तो रही फिल्म देखने की वजह,,,,,,अब आगे बढ़ते हैं। सलमान के कपड़ों के बाद फिल्म में जो खास है वो है ....मिर्ची का तड़का यानि एक्शन और कॉमेडी का बेहतरीन तालमेल.....जो पूरी फिल्म की जान है। इसके बाद बारी आती है उस खासियत की जो फिल्म की धड़कन है और फिल्म में रक्त -संचार का काम करती है,,,, वो है इस फिल्म का संगीत......जो काफी पहले ही हिट हो चुका है....तेरे मस्त-मस्त दो नैन.... सबका चैन चुराने में कितने कामयाब रहे, ये बताने की शायद जरुरत नहीं है......मुन्नी भी काफी बदनाम हो चुकी है। हम यहाँ कोई समीक्षा नहीं कर रहे हैं,ये मेरा अपना अनुभव है,जो कुछ भी मैंने महसूस किया वो लिख दिया बस इतनी सी ही बात है। दरअसल बात यह है की हमारे समाज में फिल्मों के नायक बड़ा अहम् रोल निभातें हैं...जो कुछ भी कमाल वो परदे पर करतें हैं पब्लिक उनसे इम्प्रेस हुए बिना नहीं रह पाती ....खाकी वर्दी पहने हुए दबंग के रूप में उन्हें अपना नया नायक मिल गया है। फिल्म की हेरोइन सोनाक्षी के बारें में क्या कहें,उन्होंने बॉलीवुड को नई संभावनाएं दे दीं हैं.....अपनी पहली फिल्म में ही परिपक्व अभिनय करके ये बता दिया है कि एक्टिंग उनके खून में हैं जो उन्हें विरासत में मिली है। अभिनय और खूबसूरती का अनूठा संगम हैं सोनाक्षी.....इसके आलावा अरबाज़ भी मक्खी के किरदार में खूब जमे हैं,,,,महेश मांजरेकर ने शराबी का छोटा सा रोल निभा के ये बता दिया कि एक्टिंग के वो एक मंझे हुए खिलाडी हैं......सोनू सूद के रूप में बॉलीवुड को अपना नया विलेन मिला है। जिनसे विलेन के किरदार की उम्मीद किसी ने नहीं की थी. पूरे बॉलीवुड मसाले के साथ तैयार की गए गई फिल्म कुलमिलाकर फुल-टू पैसा वसूल है। चुलबुल पाण्डेय का जादू चल गया.....और फिल्म हो गई सुपर-डुपर हिट....वो भी दबंगई के साथ......
पूजा सिंह आदर्श

Thursday, 9 September 2010

जब मैंने पहली बार बिग बी को देखा.......


पत्रकारिता ने हमेशा से ही मुझे अपनी ओर आकर्षित किया और मैंने एक पत्रकार बनने का सपना अपनी आँखों में सजाया। बस अपने इस सपने को पूरा करने के लिए मैंने एम.जे.पी रूहेलखंड विश्वविद्यालय बरेली में पत्रकारिता के कोर्स में दाखिला ले लिया। बात वर्ष २००१ की है। पत्रकार बनने का जुनून सर पे इस कदर सवार था कि चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए बस पत्रकार बनना है।पत्रकारिता की कक्षाएं शुरू होने के बाद हमें असाइनमेंट मिलने लगे थे और हम पूरे जोश व उत्साह के साथ इस काम को पूरा करने में जुट जाते थे। शुरुवात में तो हमें छोटे-छोटे असाइनमेंट दिए गए जिन्हें हमने समय से पूरा करके अपने एच.ओ.डी की नजरों में एक खास जगह बना ली थी ,अपनी इसी छवि के कारण हमें एक दिन वो असाइनमेंट मिला जिसका इंतजार हर उस फ्रेशर को होता है जो अपने कैरिएर की शुरुवात करने जा रहा हो-----------हमें काम मिला रामपुर में होने वाली श्री अमिताभ बच्चन की रैली को कवर करने का और इसके लिए तीन लोगों का ग्रुप बना दिया गया। मैं,मेरा सहपाठी मुकुल सक्सेना और दीक्षा। हम तीनो को ही रामपुर रवाना होना था लेकिन ऐन वक़्त पर दीक्षा का जाना कैंसिल हो गया,एक बार को तो ऐसा लगा कि शायद हम भी नहीं जा पाएंगे लेकिन हमने तो ठान लिया था कि जाना तो जरूर है। रिपोर्टिंग के लिए एक बार को न सही पर बिग बी को तो हर हाल में देखना ही था। फिर ऐसा मौका हमें दोबारा कहाँ मिलता??????????ये दिसम्बर की बात है ,,,सर्दिओं के दिन थे इसलिए निकलते-निकलते ही हमें देर हो गई। बरेली से रामपुर की दूरी ६५ किमी है।
जब तक हम वहां पहुंचे रज़ा कॉलेज रैली का मैदान खचा-खच भर चुका था पैर तो क्या तिल रखने भर को जगह नहीं थी। जैसे-तैसे भीड़ को चीरते हुए हम प्रेस गैलरी तक पहुंचे ,यहाँ तक पहुँचने में बैरीकेटिंग को पार करते समय मेरे घुटने में भयंकर चोट लग गई थी,उसमे से खून रिस रहा था।लेकिन बिग बी को देखने व सुनने के लिए ये कीमत बहुत कम थी। प्रेस गैलरी में मीडिया कर्मिओं का जमावड़ा लगा था। भीड़ अमिताभ बच्चन जिंदाबाद के नारे लगा रही थी.......श्री बच्चन अपने निर्धारित समय से करीब २ घंटे देरी से पहुंचे।मंच के ठीक पीछे ही हैलीपैड बनाया गया था....जिस पर देखते ही देखते धूल उडाता हुआ हैलीकॉप्टर उतरा और फिर उसमे से नीला सूट पहने उतरे श्री अमिताभ बच्चन....... जिन्हें देखते ही बस ऑंखें ठहर सी गई और सारी तकलीफें भी ख़तम हो गई......बिग बी हमसे कोई दस कदम की दूरी पर थे.....कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि बिग को देखने या उनसे कोई सवाल करने का मौका भी मिलेगा....बिग बी आए मंच पर और उनके साथ थी जया बच्चन ,अमर सिंह और मुलायम सिंह और आज़म खान । जब बिग बी ने बोंला शुरू किया तो बस तालियों की गडगडाहट ही सुनाई दी.....क्या बोलतें हैं बिग बी......धारा प्रवाह हिंदी......भाषा पर ऐसा नियंत्रण ऐसा कि अच्छे-अच्छों की बोलती बंद हो जाए.....करीब आधा घंटा मंच पर बिताने के बाद जब उन्होंने वापस हैलीपैड की ओर रुख किया तो रास्तें में मीडिया वालों ने उन्हें रोक लिया जो कि बहुत स्वाभाविक था। हम सब इतनी देर से इंतजार जो कर रहे थे.....बिग बी के रुकते ही मीडिया ने उन पर सवालों की बौछार कर दी...इन्ही सवालों के बीच एक सवाल मैंने भी कर ही डाला जिसके लिए मैंने खुद को तैयार नहीं किया बस सहसा ही मुंह से निकल गया कि..... गाँधी परिवार से इतनी दूरी क्यों????इस पर उन्होंने भी तपाक से बोल दिया कि वक़्त-वक़्त की बात है....मुझे मेरा जवाब मिल गया था......मेरे लिए बस इतना ही काफी था, इसके बाद और कुछ पूछा ही नहीं गया और किसी और ने क्या पूछा ये भी याद नहीं.....मीडिया के सवालों के जवाब सभी ने दिए...इसके बाद सब एक-एक करके हैलीकॉप्टर की ओर बढ़ गए....और धूल के गुबार के साथ पलक झपकते ही गायब हो गए.....एक नायब व्यक्तित्व के मालिक हैं बिग बी....उनके जैसा कोई न तो है और न ही हो सकता है।
मेरे जीवन का ये सबसे सुखद संस्मरण है...जिसे आप सब से बाँट कर जो अनुभूति मुझे मिल रही है उसका तो कोई अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता।उसके बाद मैं और मुकुल दोनों देर रात बस का सफ़र करके बरेली पहुंचे....अगर हम अपने कुछ साथ लाये थे तो वो थी... बिग बी... की छवि और उस रैली का अविस्मर्णीय अनुभव .......
पूजा सिंह आदर्श

Thursday, 2 September 2010

खुले आम सजता..देह का बाज़ार......


शाम हुई सज गए......... कोठों के बाज़ार,
मन का गाहक न मिला बिका बदन सौ बार।
ये शेर मैंने एक बार किसी कवि सम्मलेन में सुना था,जिसमे मुझे कई नामचीन कविओं और शायरों को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। शेर तो याद रहा लेकिन कवि नाम याद नहीं...खैर इससे कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता...इसका मतलब समझने की जरुरत है कि कितनी गहरी बात छुपी है इस शेर में.....उस insan की पीड़ा छुपी है जिसे अपना बदन बेचने जैसा घिनौना काम करना पड़ता है.....कहने को तो लिखने के लिए ये कोई नया मुद्दा नहीं है पर फिर भी ये वो मुद्दा है जिसपर,लिखना जरूरी है और लगातार लिखा भी जाना चाहिए। मानवीय संवेदनाओं के चलते कुछ सामाजिक समस्याओं के प्रति हम उतने गंभीर नहीं होते जितना हमें होना चाहिए बस यही सोच कर रह जातें हैं कि अरे....इसपर तो कई बार और बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन अपने दायित्व से पीछे न हटते हुए आज उस विषय पर कलम चलाने की सोची जो एक लड़की होने के नाते भी मुझे लिखने पर मजबूर करता है। मेरा ये लेख समर्पित है उन लड़किओं और महिलाओं के नाम जो अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए उस दल-दल में घुसने को मजबूर हो जाती हैं जिसे समाज ने वैश्यावृति का नाम दिया है।वैश्यावृति हमारे लिए कोई नयी चीज़ नहीं है ये कई सौ साल पहले भी होती थी और आज भी होती है ....वेश्यालयों को संरक्षण तब भी मिलता था और आज भी मिलता है.......इससे आने वाली सड़ांध पूरे समाज को दूषित करती है ये जानते तो सब हैं पर मानता कोई नहीं ......पर न मानने से सच झूठ में तो नहीं बदला करता ....
हर शहर में एक ऐसी बदनाम जगह जरूर होती है जिसे इस सभ्य समाज ने रेड लाइट एरिया का नाम दिया है। यहाँ शाम होते ही सज जाती है बेजान जिस्मो की मंडी,,,बेजान इस लिए कहा क्योंकि जान तो है पर आत्मा नहीं है,जिस काम को करने में आत्मा साथ न दे उसे और क्या कहा जाएगा??????अभी कुछ दिन पहले ही हमारे मेरठ शहर में यहाँ के रेड लाइट एरिया से पुलिस ने छापा मारकर करीब सात नेपाली लड़किओं को इस दल-दल से बाहर निकाला यहाँ से बरामद सभी लड़कियां नाबालिग थी और सभी की उम्र १६-१७ साल से जयादा नहीं थी। इन सभी लड़किओं को नेपाल से भारत काम दिलाने के बहाने से बहला-फुसलाकर लाया गया था। ये सब लड़कियां गरीब घरों की थी जिन्हें काम की बेहद जरुरत थी और इनकी इसी मजबूरी का फ़ायदा उठाकर,,,,जिस्म के दलालों ने इनकी इज्ज़त का सौदा करके ,इन्हें ये नरक भोगने के लिए छोड़ दिया। जहाँ हवस के भूखे भेड़िये इनके जिस्म को दिन रात नोचतें हैं। दलालों की इस मंडी में सब कुछ बिकता है......जिस्म के साथ आत्मा,इंसानियत ,भावनाएं ।इस दुनिया में सब कुछ बिकाऊ है, इसलिए इन सब के खरीदार मिल जायेंगे आपको। किसी को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि कोई इस घिनौने काम को क्यों कर रहा है बस अपना मतलब निकलना चाहिए। अब क्या होगा इन लड़किओं का,,,क्या ये समाज में सर उठा कर जी पाएंगी....क्या इनके घर वाले इन्हें अपनाएंगे??कौन तो इन्हें काम देगा??कौन इनका हाथ थामेगा????एक बड़ा सवाल हम सब के लिए.........
मुझे नहीं नहीं लगता की कोई भी औरत शौकिया इस काम को करती होगी ,किसी भी औरत को खुद को धंधेवाली कहलवाना पसंद होगा....इससे बड़ा दाग तो उसके लिए हो ही नहीं सकता। अपने घर-परिवार को पालने,अपने बच्चों को दो वक़्त की रोटी खिलाने के लिए उसे इस कीचड में उतरना ही पड़ता है। कोई भी माँ अपने बच्चे को भूख से बिलखते हुए नहीं देख सकती जब उसके पास कोई और रास्ता नहीं बचता तो अंत में उसे अपना जिस्म ही याद आता है,कि इसे ही बेच कर ही अपने बच्चे या घरवालों का पेट भर सके। क्यों??? आखिर???क्यों.... हम अपने को सभ्य कैसे कह सकते हैं जब हम किसी की मजबूरी का फ़ायदा उठा कर उससे वो काम कराएँ जिसे इस सभ्य समाज में सबसे ख़राब नजरों से देखा जाता है। न जाने कितनी मासूम लड़किओं को रोजाना इस दल-दल में धकेल दिया जाता है इनमे से शायद ही कोई खुशनसीब लड़की होती होगी जिसे इस नरक से समय रहते मुक्ति मिल जाए। पर मुक्ति मिलने से भी क्या होगा??????????????क्या ये समाज इन्हें वही इज्ज़त देगा जो इन्हें मिलनी चाहिए?????????????एक गंभीर सवाल पूरे समाज के लिए....???????
जो महिला इस गंदगी से बाहर निकलना चाहती है....क्या उसके पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं होनी चाहिए......क्या इस समाज में इनके लिए कोई जगह नहीं है।इनके मासूम बच्चों को इस गंदगी से निकालना क्या हमारा कर्त्तव्य नहीं है??हम क्या दे सकतें हैं इन्हें....इन सब के उत्तर हमे खोजने हैं अभी....लेकिन जल्द और समय रहते।
पूजा सिंह आदर्श

Saturday, 28 August 2010

ईव टीजिंग.....महिलाओं के लिए अभिशाप


हमारे देश में जितनी मुश्किलों और तकलीफों का सामना महिलाओं को करना पड़ता है उतना शायद ही किसी और को करना पड़ता होगा....हर कदम पर कठिनाइयाँ और हर मोड़ पे चुनौतियाँ तैयार रहती है इनका इम्तिहान लेने के लिए।हमारे समाज में जहाँ लड़किओं के लिए समस्याओं का अम्बार लगा है.......उन्ही समस्याओं में से एक है ईव टीजिंग यानि छेड़खानी.....ये वो समस्या या यूँ कहे कि लड़किओं के लिए वो अभिशाप है जिससे लड़किओं को तकरीबन रोज़ ही दो-चार होना पड़ता है। शायद ही कोई ऐसी लड़की या महिला होगी जिसे इस शर्मिंदगी से न गुजरना पड़ा हो। हमारे देश और समाज में ऐसे मनचलों की कोई कमी नहीं है जो लड़किओं को अपनी निजी संपत्ति समझतें हैं। स्कूल- कालेज या सिनेमा के जब छूटने का समय होता है तब देखिये कि शोहदों का कैसा जमावड़ा लगता है बाहर.....लड़किओं को तो ऐसे घूरते हैं कि जैसे वो इनके बाप की जागीर हैं,अश्लील कमेन्ट पास करना,सीटी मारना,आँख मारना,लड़किओं का पीछा करना,उनका रास्ता रोकना जैसे दुष्कर्मों का तो जैसे इन शोहदों को लाइसेन्स मिला हुआ है और वो भी माँ-बाप ने दे रखा है कि जाओ....छेड़ो लड़किओं को.....कोई तुम्हे रोकने-टोकने वाला नहीं है। जितनी बेखौफी से ये लोग लड़किओं को छेड़ते हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि घरवालों ने नहीं बल्कि सरकार ने ही इन्हें इजाज़त दे रखी है। महिलाओं के साथ पुरुषों द्वारा किया जाने वाला यह शर्मनाक बर्ताव कभी-कभी इतना भयानक होता है कि इससे तंग आकार लड़कियां खुदखुशी तक कर लेती हैं। उन्हें इस कठोर निर्णय तक पहुँचाने के लिए कौन जिम्मेदार है?
कोई यह नहीं देखता या सोचता कि लड़की ने ऐसा क्यों किया होगा? उल्टा उस पर ही आक्षेप लगा देतें हैं कि लड़की का ही चाल-चलन ठीक नहीं होगा तभी उसने ऐसा किया लेकिन सच्चाई जानने की तो कोई कोशिश भी नहीं करता। और कोई करे भी तो क्यों??????इस समाज के ठेकेदार ही हैं...मर्द....अपने को मर्द तो बड़ी शान से कहतें हैं पर कर्म तो चूहों जैसा करतें हैं..........अब आप ही बताइए कि किसी भी लड़की को छेड़ के बाइक या साईकिल पर भाग जाना कहाँ की मर्दानगी है.....अगर वास्तव में मर्द के बच्चे हो तो वही रुक कर दिखाओ....अगर लड़कियां तुम्हे छठी का दूध का न याद दिला दें तो मेरा नाम बदल देना .....किसी को अश्लील बात कहकर भाग जाने से बड़ा बुझदिली का काम कोई नहीं है।
लड़किओं के साथ छेड़खानी बहुत ही आम बात हो गई है....पुलिस और प्रशासन चाहे कितनी भी कोशिश कर लें लेकिन इस समस्या से छुटकारा मिलना तो दूर की बात है, ये समस्या कम तक नहीं हुई है।महिला पुलिस को सादे कपड़ों में स्कूल-कालेज और सिनेमाओं के बाहर तैनात कर के तथा ऑपरेशन दीदी भी चला कर देख लिया पर नतीजा सिफर ही निकला। अब इस मुसीबत से कैसे निपटा जाए या इन मनचलों को कैसे सबक सिखाया जाए.....मुझे तो इस का एक ही हल दिखाई देता है कि हर लड़की अपनी सुरक्षा खुद करे और अपनी पुलिस खुद बने। अपने को शारीरिक व मानसिक दोनों तरह से मजबूत बनाये और जब कोई मनचला उसे छेड़ने कि जुर्रत करे तो चुप-चाप सहने की बजाय उसका मुंहतोड़ जवाब दे। अभी तक ये शोहदे यही समझतें हैं कि इन लड़किओं के बसकी कुछ नहीं है, ये तुम्हारी हर बदतमीजी बिना कोई विरोध किए सहती रहेंगी क्योकि लड़कियां इनकी प्राइवेट प्रोपर्टी हैं। लेकिन अब इन्हें भी यह याद दिलाना जरूरी है कि इनके घरों में भी माँ-बहने हैं और किसी दूसरे की बहन -बेटियों को छेड़ने से पहले दस बार सोचो।लड़कियां न तो शारीरिक रूप से कमजोर हैं और न ही मानसिक रूप से ये बात इन मनचलों को समझानी होगी....ऐसे नहीं तो वैसे.....बस चुप रहने की बजाय उसका सामना करना होगा....क्योंकि ये महिलाओं के सम्मान की लड़ाई है और अपने सम्मान की रक्षा करने का सबको अधिकार है। जो महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाएगा उसे उसका परिणाम भी भुगतना होगा।
पूजा सिंह आदर्श

Tuesday, 17 August 2010

क्या हम वाकई आज़ाद है...यही मायने हैं आज़ादी के?????



अभी दो दिन पहले ही हमने अपनी आज़ादी की ६३वीं सालगिरह मनाई है, इस मौके पर देश के सर्वश्रेष्ठ लोगों ने अपनी तमाम उपलब्धियां भी गिनवा दी कि अब तक हमारे देश को इन लोगों ने क्या दिया है और देश ने कितनी तरक्की की है............अब इन लोगों के इस दमदार दावे में कितना दम हैं इस पर एक बड़ा सवालिया निशान है????क्या हम आज भी सच में आज़ाद हैं और खुली आज़ाद हवा में सांस ले रहे हैं????ये एक विचारणीय प्रश्न है........क्या सिर्फ अंग्रेजों की दासता से मुक्ति पा लेने को ही आज़ादी कहते हैं?जिन लोगों के संघर्ष ने हमें उस नरक से बाहर निकाला जिनके अमूल्य बलिदान की बदौलत ही हम आज अपने वजूद को कायम रखे हुए हैं क्या वाकई में हम उनके प्रति सच्ची श्रधांजलि अर्पित करते हैं या उनको याद करने का ढोंग मात्र करतें हैं।हम कितना भी चिल्ला-चिल्ला के यह कह लें की हम आज़ाद हैं और देश तरक्की कर रहा है,हम उन्नति की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहें हैं लेकिन सच वही है ...ढ़ाक के तीन पात......
केवल कह देने भर से या प्रगति का ढोल बजाने से ये सच हो जाएगा कि जैसा सपनो का भारत हमारे पूर्वजों ने सोचा था क्या ये भारत वैसा ही है ?.....नेहरु,गाँधी,शास्त्री,सुभाष के देश की क्या हालत हो गई है। अगर हमारे देश के कर्ता-धर्ता ये सोचते हैं कि हमारे देश में तो सब ठीक चल रहा है और सब आज़ादी का जश्न मन रहें हैं तो ये सरासर गलत सोचतें हैं और बहुत बड़ी गलत फहमी का शिकार हैं। जिस देश में आज भी लोग अशिक्षित हैं,बेरोजगार हैं,अन्धविश्वासी हैं.रुढ़िवादी हैं,जहाँ आज भी लोगों को पीने का पानी नहीं मिलता,बिजली नहीं मिलती,यहाँ तक की बुनियादी सुविधा रोटी-कपडा और मकान नहीं मिलता,जहाँ आज भी बहुत से लोगों को दो जून की रोटी मयस्सर नहीं होती, दवा और इलाज के अभाव में लोग तड़प-तड़प के मर जातें हैं।भ्रष्टाचार की जड़ें अब इतनी मजबूत हो चुकी हैं कि इन्हें उखाड़ फेंकने में शायद बरसो लग जाएँ।देश के आम नागरिक को सुरक्षा के नाम पर क्या मिला है बम के धमाके और ताबड़तोड़ चलती गोलियों की आवाज़.....जिस देश में देश का आधार और आधी आबादी कही जाने वाली महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं,जो अकेले बेख़ौफ़ कहीं आ ,जा नहीं सकतीं,उनकी इज्ज़त पे दाग लगाने के लिए भेड़िये खुले आम घूमते हों। इतना सब हो जाने के बाद भी क्या हम आज़ाद हैं?,,,,,राधा-कृष्ण ,हीर राँझा के देश में दो प्यार करने वालों को नफरत की बलि चढ़ा दिया जाता है सिर्फ अपनी झूठी और दो कौड़ी की इज्ज़त के लिए। ये इज्ज़त तब कहाँ चली जाती है जब पडोसी दुश्मन अपनी धरती माँ की इज्ज़त पर हाथ डालता है।
बेटों की लालसा में हम अजन्मी बेटिओं को निर्दयता से मार रहें हैं और अपने आप को गर्व से आज़ाद कहतें हैं। जिस देश में कई हज़ार लोग सिर्फ एक वक़्त खाना खातें हों और भूखे पेट सोना जिनकी मजबूरी हो,गरीबी जिनका नसीब है ऐसे में क्या हमे आज़ादी का जश्न मानना चाहिए????गहराई से आत्मचिंतन करिए और फिर बताइए की क्या मैंने कुछ गलत कहा है......जो मेरे इन सवालों को गलत ठैरा दे उसके लिए ये खुली चुनौती है कि वो इन सारे प्रश्नों का तर्क सहित उत्तर दे......अगर कोई यह कहता है कि नहीं आपके ये सारे तर्क गलत हैं और देश वाकई तरक्की कर रहा है और हम स्वतंत्र हैं तो मेरी नजरों में उससे बड़ा देशद्रोही कोई नहीं.....अब बदसूरत शक्ल आईने में बदसूरत ही दिखेगी और अगर कोई ये कहे कि नहीं सुंदर दिख रही है तो.... दिल बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है.....सिर्फ भाषण देने भर से देश तरक्की नहीं करता। आज़ादी मिले गरीबी से,भुखमरी से,भ्रष्टाचार से अशिक्षा से,रूढ़िवादिता से तभी तो हम आज़ाद होने का दवा कर सकतें हैं।
जिन लोगों ने इस देश को अपने खून से सींचा,उस देश के लोग अब इसका खून चूस रहें हैं। जिस तरह भगत सिंह ने असेम्बली में बम फेंकते समय यह कहा था कि बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है उसी प्रकार आज जब हम बहरे होकर अपने कानो पे हाथ रख कर बैठे हैं, हमें भी झकझोरने के लिए किसी धमाके की ही जरुरत है।जब तक हमारी अंतर-आत्मा साफ़ नहीं हो जाती और हम आज़ादी के सही मायने नहीं समझते तब तक हमें आज़ादी का जश्न मनाने का कोई हक नहीं है।


Tuesday, 3 August 2010

कांवड़ यात्रा.......पुण्य या पाप.....


सावन का महीना आते ही पूरा माहौल शिवमय हो जाता है.....अगर कुछ सुनाई देता है तो वो है हर-हर महादेव की गूँज। वैसे तो भगवान भोले नाथ पूरे भारत वर्ष में बारह महीने ही पूजे जातें हैं लेकिन सावन में इनका महत्व कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है। कुंवारी लड़किओं से लेकर बुजुर्ग तक सब सावन के महीने में भगवान शिव को प्रसन्न करने में लीन रहतें हैं।कुछ लोग सिर्फ सावन के सोमवार को ही जल चढ़ाते हैं और कुछ लोग पूरे सावन ही शिवालयों में जाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करतें हैं।सावन लगते ही अगर कुछ विशेष होता दिखाई देता है तो वह है कांवड़ यात्रा। कांवड़ लाने के लिए शिव के भक्त पूरे साल इंतजार करतें हैं कि कब वो हरिद्वार के लिए प्रस्थान करेंगे और कठिन यात्रा को पैदल पार करके भगवान भोले नाथ पर चढाने के लिए जल लेकर आएंगे। कुछ लोग तो गंगोत्री तक से भी जल लेकर आतें हैं। प्.उत्तर प्रदेश समित दिल्ली,हरियाणा,राजस्थान तक में कांवड़ लाने का प्रचलन है।इस समय कांवड़ यात्रा शुरू हो चुकी हैं और अपनी चरम सीमा पर चल रही है और आठ अगस्त को पड़ने वाली सावन की शिवरात्रि को भोले नाथ के जलाभिषेक के साथ ही समाप्त होगी। शिवरात्रि से एक दिन पहले ही लाखों श्रद्धालु अपने मुकाम पर पहुँच जातें हैं।
ऐसा नहीं है कि कांवड़ यात्रा कोई नयी बात है यह सिलसिला कई सालों से चला आ रहा है फर्क बस इतना है कि पहले इक्का-दुक्का शिव भक्त ही कांवड़ में जल लाने की हिम्मत जुटा पाते थे लेकिन पिछले ५-७ सालों में ऐसा क्या हुआ कि हर साल जल लाने के लिए शिव भक्तों कि संख्या बढती ही जा रही है। इक्का-दुक्का से सैंकड़ों फिर हजारों और अब लाखों,साल दर साल कांवड़ लाने वालों की तादात बढती ही जा रही है। क्या इस कलयुग में भगवान को प्रसन्न करने और पुण्य कमाने का यही एक तरीका रह गया है??????............कांवड़ यात्रा को सफल और सुरक्षित बनाने के लिए भारी तादात में पुलिस और प्रशासन लगा हुआ है। लाखों की संख्या में पहुँचने वाले श्रधालुओं की सुरक्षा प्रशासन के लिए चुनौती बनी हुई है।
कांवड़ लाने वालों की संख्या प्रति वर्ष जिस रफ़्तार से बढ़ रही है वो एक सोचनीय विषय है ये वाकई पुण्य कमाने का जरिया है या फिर कुछ और........कही कांवड़ लाने की आड़ में कोई और धंधा तो नहीं चल रहा। हर साल नारकोटिक्स विभाग की नजर रहती है कांवड़ लाने वालों पर। सबको पता है कि कांवड़ की आड़ में हर साल करोड़ों रूपये के नशे का कारोबार होता है। कांवड़ में छुपा कर अफीम,भांग,चरस की तस्करी की जाती है। हथियार भी छुपा कर इधर से उधर किए जाते है। कांवड़ के बहाने ये कारोबार खूब फल-फूल रहा है। जानते सब हैं पर मजाल है कि कोई कांवड़ को हाथ भी लगा दे,चेक करना तो दूर की बात है। धर्म की आड़ लेकर खुले-आम गलत काम होता है पर हम कुछ नहीं कर सकते क्योंकि आस्था सब पे भारी होती है।धर्म के नाम पर कुछ भी आसानी से किया जा सकता है ये हमारे देश की खासियत है। धर्म के नाम पर हम किसी को भी और कहीं भी बेवक़ूफ़ बना सकतें हैं इसका जीवंत उदाहरण है कांवड़ यात्रा। अब इसमें एक नयी बात और जुड़ गई है और वो हैं.....महिलाएं.......पहले इनका कांवड़ यात्रा से दूर-दूर तक कोई तक कोई वास्ता नहीं होता था,लेकिन अब महिलाएं भी पीछे नहीं है कांवड़ लाने में। जब महिलाएं जाएँगी तो लाज़मी है कि बच्चे भी जायेंगे। महिलाओं और बच्चों की आड़ में भी ये धंधा जोरों पर चलता है। ये काम करने वालों को पता है की महिलाओं को हाथ लगाने वालों की क्या दशा होगी, बस इसी बात का ये लोग फ़ायदा उठाते हैं। अगर कांवड़ जरा सी भी खंडित हो जाए तो बवाल होते भी देर नहीं लगती,श्रद्धालु आगजनी,पथराव और मारपीट करने में जरा भी देर नहीं लगाते। कहने का मतलब ये है कि कांवड़ की आड़ में जो लोग ये धंधा कर रहें हैं उनको प्रशासन खुद ही बढ़ावा दे रहा है,इनको रोकने-टोकने वाला कोई नहीं है।
गलत काम जो हो रहा है वो तो है ही लेकिन कांवड़ यात्रा से पर्यावरण को जो भारी नुकसान होता है उसका जिम्मेदार कौन है?????हर साल लाखों श्रद्धालु जल लेने हरिद्वार पहुंचतें हैं। इतने लोगों के कारण गंगा तो मैली होती है पूरा वातावरण भी दूषित हो जाता है। जगह-जगह कैंप लगने के कारण झूठे पत्तलों के ढेर,खुले में मल-मूत्र करने के कारण फैलने वाली दुर्गन्ध से आम लोगों का जीना दूभर हो जाता है,किन्तु इन सब के बारें में कौन सोचता है। फिर वही बात आ जाती है कि आस्था सब पर भारी है....धर्म की आड़ में गलत काम हमेशा से ही होता आया है ये कोई नयी बात तो है नहीं.....लेकिन लोगों को ये तो सोचना ही चाहिए कि कम से कम धर्म की आड़ में तो ये सब न करें.....पुण्य कमाने के तो और भी बहुत से तरीके हैं....पुण्य ही कमाना है तो देश और समाज की सेवा करके ही कमा लो तो वास्तव में पुण्य ही मिलेगा........
पूजा सिंह आदर्श

Monday, 2 August 2010

सनकी हैं क्या राहुल महाजन....????


राहुल महाजन एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं.........इस बार फिर उनके साथ एक और नया विवाद जुड़ गया है....वैसे ये उनके लिए नया बिल्कुल नहीं है इससे पहले भी वो इसी प्रकार के विवाद का हिस्सा रह चुके हैं।क्या राहुल महाजन घरेलू हिंसा के आदि हो चुकें हैं......इस बार भी उन्होंने अपनी पहली पत्नी श्वेता की तरह,अपनी नई पत्नी डिम्पी महाजन के साथ मारपीट की। डिम्पी ने पूरी मीडिया के सामने खुद बताया कि राहुल उनके साथ मारपीट करतें हैं,एक बार तो किसी मामूली सी बात पर उन्होंने उनपर बन्दूक तान दी थी...जब इस बात की शिकायत उन्होंने अपनी सास यानि राहुल की माँ से की तो राहुल ने उन्हें इस बात पर भी मारा था और मारना भी कोई ऐसा-वैसा नहीं राहुल ने डिम्पी को लात-घूंसों से मारा और उनके बाल पकड़कर खींचे.......अब चाहे राहुल डिम्पी से कितनी भी सुलह कर लें,मनाकर उन्हें अपने घर भी ले जाएँ या फिर डिम्पी भी उन्हें माफ़ कर दें पर राहुल की असलियत तो जगजाहिर हो ही गई है कि राहुल किस किस्म के इंसान है।
अब सवाल ये उठता है कि क्या ये सब करना राहुल महाजन को शोभा देता है???????ये राहुल महाजन के नाम के आगे एक बड़ा सवालिया निशान है कि जो महाजन नाम उनके साथ जुड़ा हुआ है क्या कभी उसके बारें में राहुल नहीं सोचते.......प्रमोद महाजन कि मौत के बाद ही दुनिया ने जाना कि राहुल महाजन कौन है?प्रमोद जी अगर जिन्दा होते तो ये दुनिया शायद जान भी न पाती कि राहुल महाजन कौन है और एक तरह से ये अच्छा भी होता। प्रमोद महाजन जानते थे अपने बेटे के बारे में ............कौन बाप नहीं जानता होगा कि उसका बेटा कैसा है वो उसका नाम रोशन करेगा या नाम पर धब्बा लगाएगा। पिता की मौत के तुरंत बाद ही नशे की हालत में मिलना और नशे के ओवर डोज के कारण अस्पताल में भर्ती होना फिर अचानक ही अपने बचपन की दोस्त श्वेता सिंह से शादी कर लेना और कुछ दिन बाद ही उसके साथ मारपीट करना इसके बाद श्वेता का राहुल का घर छोड़ कर उनसे तलाक लेकर हमेशा के लिए उनके घर को अलविदा कह देना। ये सब घटनाक्रम राहुल महाजन की जिंदगी में इतनी तेजी से बदले कि खुद उनको भी इसका अहसास नहीं हुआ। फिर अचानक राहुल महाजन इस उम्मीद को लेकर बिग बॉस में नज़र कि अब वो दुनिया को अपने बारें सही ढंग से बता सकें कि वास्तव में राहुल महाजन क्या हैं लेकिन वहां भी राहुल अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आये,एक तरफ तो पायल रोहतगी से नजदीकीयां बढाई दूसरी तरफ बिग बॉस के घर की दीवार कूद कर भाग गए.....इसका मतलब तो ये हुआ कि राहुल महाजन को विवादों से बेहद प्यार है और विवादों के साथ उनका चोली दामन का साथ है। राहुल की इन सब हरकतों से तो यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो कभी नहीं सुधरेंगे अगर ऐसा न होता तो खुद उनकी बहन पूनम महाजन राव ये कहने कि बजाय कि किसी भी महिला पर हाथ उठाना अपराध है क्योकि हर महिला का अपना आत्मसम्मान होता है यदि कोई इसे ठेस पहुँचाता है तो ये समस्त नारी जाती का अपमान है,अपने भाई का बचाव करती नज़र आती। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया और पहले भी कुछ नहीं किया था क्योकिं वो जानती है कि उनका भाई वास्तव में क्या है?पूनम महाजन और राहुल महाजन में जमीन-आसमान का अंतर है। पूनम ने अपने पिता के नाम को बढ़ाने की कोशिश की है जबकि राहुल ने अपने पिता के कमाए हुए नाम को ख़राब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
राहुल महाजन अब चाहे कुछ भी कह लें मगर दुनिया उनका सच जान चुकी है कि वो किस तरह के इन्सान हैं। वो कहतें हैं न कि कुत्ते की दुम को अगर बारह बरस तक भी नलकी में रखा जाए तो भी वो सीधी नहीं हो सकती यही हाल राहुल महाजन का भी है। अच्छा हुआ कि प्रमोद महाजन इस दुनिया में नहीं हैं,नहीं तो उन्हें अपने बेटे की वजह से जो sharmindgi उठानी पड़ती उसकी भरपाई वो शायद ही कर पाते।
पूजा सिंह आदर्श

Friday, 16 July 2010

क्या हमें जीने का कोई हक नहीं......क्या हम इन्सान नहीं ???


अपनों से बिछड़ने का दर्द क्या होता है,उसकी पीड़ा क्या होती है ये बताने की शायद जरुरत नहीं है। किसी अपने से अलग होने का जरा सा ख्याल भी हमें झकझोर के रख देता है। आदमी अगर दुनिया से चला जाए,मौत उसे हमसे छीन ले तो हम उसे विधि का विधान मानकर स्वीकार कर लेते हैं और यदि हम जानबूझ कर किसी अपने को खुद से अलग कर दें,उससे सारे रिश्ते खत्म कर लें,उसे किस्मत के सहारे छोड़ दें। हमें उसे अपना कहते हुए भी शर्मिंदगी महसूस हो,तो क्या हम वाकई उसके अपने हैं और वास्तव में उससे सच्चा प्यार करतें हैं????
लेकिन ये सच है ऐसा भी होता है,मैंने ऐसे लोगो को बहुत नजदीक से देखा है और उनका दर्द भी बहुत शिद्दत से महसूस किया है.......हम बात कर रहें हैं बरेली के मानसिक चिकित्सालय के उन मरीजों की जो ठीक हो जाने बाद भी वहां रहने को मजबूर हैं। घुट-घुट के जीना उनकी नियति बन चुका है। ऊँची-ऊँची दीवारें,दूर-दूर तक पसरी ख़ामोशी ,मानसिक संतुलन खो चुके मरीजों की सन्नाटे को चीर देने वाली आवाज़,बहार की दुनिया से बेखबर,अन्जान। ऐसे माहौल में रहना इनका नसीब बन चुका है क्योंकि इनके परिवार वाले इन्हें ठुकरा चुके हैं। ये लोग भूल चुके हैं कि इनका कोई अपना है जो ठीक हो जाने के बाद इनके साथ अपने घर जाने की राह देख रहा है लेकिन इनकी आँखे अब राह देखते-देखते पथरा चुकी हैं क्योकि इनके अपने अब इनसे बहुत दूर जा चुकें हैं। बरेली के मानसिक अस्पताल में कई ऐसे रोगी हैं जो पूरी तरह से ठीक हो चुकें हैं और घर जा सकतें हैं लेकिन लोग इन्हें यहाँ छोड़ने तो आतें हैं पर लेने कभी नहीं आते। अस्पताल के नियमानुसार जब तक मरीज को उसके घर से कोई लेने न आये उसे छुट्टी नहीं दी जा सकती। ठीक हो चुके मरीजों की तादात इतनी ज्यादा है कि नए मरीजों को भर्ती करने में काफी दिक्कत आती है। पचास साल तक पुराने मरीज यहाँ भर्ती हैं।
अस्पताल में भर्ती करते समय इनके परिवार वाले पता और टेलिफोन नंबर तक गलत लिखा जातें हैं,जब उनसे संपर्क किया जाता हैं तो पता चलता है कि सारी सूचना ही गलत है। चिकित्सालय प्रशासन की लाख कोशिशों के बावजूद भी इनके घर वालों का कोई अता-पता नहीं चल सका। ऐसे में अब क्या किया जाए चूँकि इन्हें यूँ छोड़ा भी नहीं जा सकता इसलिए इन्हें अस्पताल में रखना मजबूरी है। मनोरोग विशेषज्ञ डा.वी.के श्रीवास्तव का कहना है कि अस्पताल में कई ऐसे मरीज हैं जो पूरी तरह से ठीक हो चुके हैं और घर जा सकतें हैं। ये लोग घर जाकर सामान्य जीवन जी सकतें हैं और परिवार का मॉरल सपोर्ट व भरपूर प्यार मिले तो इन्हें किसी भी दवा की भी कोई जरुरत नहीं है किन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा कम ही होता है। ऐसे बहुत ही कम मरीज हैं जो ठीक जो जाने के बाद वापस अपने घर जा पातें हैं।
स्तिथि बहुत गंभीर है पुराने ठीक हो चुके मरीजों के कारण नए मरीज भर्ती करने में काफी परेशानी होती है क्योकि मरीज ज्यादा हैं और जगह कम..........कई महिलाएं तो ऐसी हैं जिन्हें उनके ससुराल वाले जबरन ये कहकर भर्ती करा गए कि इनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है जबकि वे बिल्कुल ठीक हैं इन महिलाओं ने रो-रो कर कई बार अपनी व्यथा सुनाई है और अपने घर का पता भी बताया है लेकिन इसके बदले में उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला है। उनकी हालात ज्यों की त्यों बनी हुई है और ये महिलाएं यहाँ नरक भोगने को विवश हैं। यदि किसी स्वस्थ आदमी को मानसिक रोगियों के बीच छोड़ दिया जाए तो उसकी क्या दशा होगी इसका अंदाजा लगा पाना उन लोगों के लिए तो आसान है जो मानवता को समझतें है बाकीओं के लिए जरा मुश्किल है।
ठीक हो चुके मरीजों के लिए पुनर्वास एक गंभीर समस्या है क्योकि ठीक हो जाने के बाद भी उनके लिए वहां रहना क्या उचित है?क्या वहां का माहौल उन्हें ठीक रहने देगा?इन सब की परवाह किसे है?कोई इनके बारें में सोचना नहीं चाहता और सोचेगा भी भला क्यों इनमे से कोई उनका अपना नहीं है ना ?जब उनके अपने ही उन्हें भूल चुके हैं तो गैरों से उन्हें कोई शिकवा नहीं है। इन्हें दरकार है उस हाथ की जो आगे बढ़कर इन्हें सहारा दे,इनकी धुंधली पड़ चुकी नजरों को नई रौशनी दे। इसकी पहल करने के लिए किसी ना किसी को तो आगे आना ही होगा फिर चाहे वो स्वयं सेवी संस्था हो या जिला प्रशासन। अस्पताल में ये लोग भले ही कुछ ना कुछ काम करके अपना समय काट लेतें हों पर परिवार के साथ समय बिताना किसे अच्छा नहीं लगता। अपने माँ-बाप,भाई-बहन के साथ जिन्दगी के खूबसूरत लम्हे कौन नहीं बिताना चाहता। जिन्दगी है ही इतनी खूबसूरत कि जीने को हर किसी का मन करता है,इन लोगों का भी तो करता होगा?इंसानियत के नाते इन लोगों के बारें में भी सोचने का फ़र्ज़ बनता है हमारा ।
पूजा सिंह आदर्श