Wednesday, 21 September 2011

मिड-डे-मील.या आत्मसम्मान का क़त्ल ..


साक्षरता की कमी या यूँ कहे कि निरक्षरता हमारे देश की सबसे बड़ी गंभीर समस्या है ...आज भी गाँव-देहात की बात तो छोड़ दें ,शहरों में भी बच्चे स्कूल नहीं जाते या अगर गए भी तो कक्षा ५ के बाद स्कूल जाना बंद। माध्यमिक और उच्च शिक्षा तो बहुत दूर की कौड़ी है। हम आज भी विकासशील देशों की श्रेणी में आते हैं... क्यों????इसके पीछे साक्षरता की कमी बहुत बड़ा कारण है। जिस देश के नौनिहाल ही अनपढ़ होंगे उस देश का मुस्तकबिल कैसा हो सकता है??एक संजीदा सवाल ,,पूरे समाज के सामने ??
देर से ही सही लेकिन ये बात हमारी सरकार को समझ में आई। इसीलिए सरकार ने ग्यारवीं पंचवर्षीय योजना में साक्षरता को शामिल कर लिया है। अब देश में संपूर्ण साक्षरता लक्ष्य बन गई है।कक्षा ५ तक प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया गया कि कम से कम कक्षा ५ तक सभी बच्चे स्कूल जाये और शिक्षा ग्रहण करें। इसलिए सर्व शिक्षा अभियान योजना शुरू की गई...जिसका स्लोगन है ....सब पढ़ें,सब बढ़ें। यहाँ तक तो सब ठीक है कि इस समस्या पर ध्यान दिया गया ,योजना बनाई गई लेकिन सवाल ये उठता है कि कोरी योजनायें बनाने से क्या होगा ??स्कूल में पढने के लिए बच्चे भी तो आने चाहिए। और ये एक बहुत बड़ी चुनौती है.....कि बच्चों को पढने के लिए कैसे प्रेरित किया जाये ??बच्चों का स्कूल आना बेहद जरूरी है इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए। इसी बात को ध्यान में रखते हुए केंद्र व राज्य सरकार ने एक योजना शुरू की..जिसका नाम है मिड-डे-मील यानि मध्यान भोजन। इस योजना का उद्द्येश्य है स्कूल में बच्चों की संख्या को बढ़ाना....सरकार का ऐसा मानना है कि यदि स्कूल में बच्चों को मुफ्त भोजन दिया जाये तो बच्चे पढने आएंगे। इसके लिए स्कूल में बाकायदा एक रसोई,एक कुक की व्यवस्था की गई और इस बात पर भी ध्यान देने को कहा गया कि बच्चों को दिया जाने वाला भोजन पौष्टिक और स्वच्छ होना चाहिए। शिक्षकों को भारी निर्देश भी दिए गए कि ये सारी व्यवस्था एकदम सुचारू रूप से चलनी चाहिए अन्यथा शिक्षक नप जायेंगे।
योजना लागू हुई विवादों के साथ आगे भी बढ़ी और आज भी चल रही है.....लेकिन सबसे बड़ा सवाल यहाँ यह उठता है कि क्या मिड-डे -मील योजना वास्तव में बच्चों के हित में है.. ?????क्या सिर्फ खाना बाँट देने से बच्चे स्कूल आते हैं.. ??अगर आते भी हैं तो क्या पढने आते हैं...????और क्या लाइन में खड़ा करके खाना बाँट कर हम उनको भीख नही दे रहे...????क्या हम बच्चों के अंदर का आत्मसम्मान खत्म नही कर रहे...???क्या मुफ्तखोरी की आदत नही डाल रहे उनमे....???प्राथमिक स्कूल में पढने वाले बच्चे खाने के लिए लाइन में लगे हुए ऐसे मालूम देते हैं, जैसे मानो किसी लंगर की लाइन में खड़े हों। बच्चे का मन एक कोरी स्लेट की तरह होता है जिसपर जो चाहो वो लिख दो। बच्चा वही सीखता है जो वह देखता है और अनुभव करता है। जब उसे बिना कुछ किए ही खाने की आदत पड़ जाएगी फिर क्या होगा???कक्षा ५ के बाद मिड-डे -मील कहाँ से आयेगा..??क्या ये नन्हे-मुन्हों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है ???ऐसे बहुत सारे सवाल हैं। जिनका उत्तर अभी किसी की समझ में नहीं आ रहा है...लेकिन इसके दूरगामी परिणाम हमें एक दिन जरूर दिखाई देंगे। बच्चों को भोजन देने की बात ठीक है लेकिन मुफ्त में नहीं ,अगर उनको खाना देना ही है तो उसके बदले में उनसे श्रम करवाया जाना चाहिए कोई भी ऐसा काम जो उनके स्तर का हो,जैसे-फुलवारी में काम कराना,कक्षाओं को साफ़ रखना,स्कूल की साफ़-सफाई का ध्यान रखना,खाना बनवाने में मदद करना आदि। जिसके बदले में उन्हें खाना दिया जाये तो उनके अंदर का आत्मसम्मान मरना नही चाहिए बल्कि उन्हें ऐसा लगे कि हमने कुछ काम किया है तब उसके बदले में हमें रोटी मिली है। मुफ्त में खाना बांटने से बच्चों का भविष्य बिगाड़ रहें हैं हम। इसके साथ ही न तो बच्चों को अच्छा साफ़-सुथरा और पौष्टिक भोजन ही मिल पाता है। खाने के नाम पर सिर्फ खाना-पूरी हो रही है ये तो सभी अच्छे से जानते हैं और देख रहे हैं ।
बच्चे हमारे देश का सुनहरा मुस्तकबिल हैं। उनके ही नाजुक कंधो पर देश भार है। ये कंधे इतने मजबूत होने चाहिए कि अपने देश के भविष्य को संभाल सकें। मेहनत और आत्मसम्मान के साथ कमाई हुई रोटी को निवाला बना सकें।
पूजा सिंह आदर्श

Saturday, 17 September 2011

अपने बच्चे को मौत नहीं,जिन्दगी दीजिये.....

तेज रफ़्तार आज के दौर की पहचान बन चुकी हैधीमे चलने वालों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है, ही उनकी कोई क़द्र हैऔर तेज़ रफ़्तार को ही अपनी जिन्दगी बनाने वाले कोई और नहीं है बल्कि आज के युवा हैं.....युवाओं की जिन्दगी बन चुकी है...तेज़ रफ़्तार ....जिसकी उन्हें नशे की तरह इस कदर आदत पड़ चुकी है..कि इस नशे के बिना सुकून नहीं मिलता। युवाओं के लिए ये नशा है... मोटरबाइक पर फर्राटे के साथ उड़ान भरने का और हवा के साथ बातें करने का। आजकल युवाओं सर पर एक अजीब सा भूत सवार है......अपनी बाइक को इतना तेज़ दौड़ाने का,,कि अपनी अनमोल जिन्दगी को भी दावं पर लगाने से नहीं चूकते। उन्हें इस बात का जरा भी अहसास नही कि तेज़ रफ़्तार से सड़कों पर दौड़ने वाली ये बाइक उनकी जरा सी लापरवाही के कारण उन्हें मौत के मुंह में भी धकेल सकती है। जैसा कि अभी पूर्व क्रिकेटर अजहरुद्दीन के साथ हुआ,बाइक पर सवार उनके जवान और होनहार बेटे अयाजुद्दीन की ऐसी ही एक सड़क दुर्घटना में दर्दनाक मौत हो गई। उनके साथ उनका एक फुफेरा भाई भी इस घटना में मौत का शिकार हुआ। किसी भी परिवार में एक साथ दो-दो जवान मौत का हो जाना किसी कहर से कम नहीं है और किसी भी इंसान को अंदर तक तोड़ देने के लिए काफी है। ये वो दर्द है जिसकी टीस जिन्दगी भर तक उठेगी।
लेकिन ये क्यों हुआ ????क्या ये जानना जरूरी नहीं है ???बिल्कुल है ....माता-पिता अपने बच्चे को लाड में आकर बाइक का वो तोहफा दे देते हैं जो शायद उनकी मौत की वजह बन जाता है।माँ-बाप ने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा होता कि अपने बच्चे जो तोहफा वो लाकर दे रहे हैं वो उनसे उनका बच्चा ही छीन लेगा???आजकल बच्चा १६-१७ साल का हुआ नही कि उसे चलाने के लिए मोटरबाइक चाहिए। बाइक पर चलना फैशन के साथ-साथ एक स्टेटस सिम्बल बन गया है। लड़के सोचते हैं कि १०वी पास करते ही माँ-बाप उन्हें बाइक दिलवा दें,जिससे उनके दोस्तों के बीच उनका रुतबा और बढ़ जाये...बाइक लेने के साथ ही इन युवाओं का एक और शौक भी परवान चड़ता
है और वो है....मोटरबाइक के साथ खतरनाक करतब दिखाना यानि स्टंटबाज़ी करना। इस शौक का जुनून इस कदर है कि इन्हें अपनी जान तक की कोई परवाह नहीं होती।
इनदिनों बाज़ार में तरह-तरह की मोटरबाइक से पूरा बाज़ार पटा हुआ है......५० हज़ार रु तक से लेकर १५ लाख रु तक की बाइक बाज़ार में उपलब्द है । जिसमे पावर इंजन,पावर ब्रेक,हाई स्पीड और न जाने कितनी खूबियाँ हैं। जो लड़कों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं।एक से एक बढिया और खूबसूरत बाइक बाज़ार में मौजूद है। जिसे देखते ही किसी भी बाइक शौक़ीन का दिल ललचा जाए। बाइक चलाने के शौक़ीन युवा ग्रुप बनाकर रात में सुनसान सड़कों पे रेस लगाने निकलते हैं। और यही सुनसान सड़के बनती है उनके स्टंट दिखाने की जगह। और कभी-कभी यही सड़के इनकी जान की दुश्मन बन जाती हैं और निगल जाती है कई मासूम जिन्दिगियाँ । अपने जरा से शौक और जुनून को पूरा करने के लिए लोग अपनी जिन्दगी तक की परवाह नहीं करते। यहाँ कहने का ये मतलब बिल्कुल भी नही है कि बाइक हमेशा ही खतरनाक होती है...हमारे देश में अगर दुपहिया वाहन की बात करे तो बाइक लोगो की पहली पसंद है ....लाखों लोग रोज़ बाइक पर सफ़र करते हैं...अगर सावधानीपूर्वक चलते हैं तो जान बच जाती है और सही सलामत घर पहुँच जाते हैं...और अगर जरा सी भी लापरवाही हुई तो सीधे अस्पताल या फिर शमशान ही पहुँचते हैं।सड़क दुर्घटनाओं की अगर बात करे तो रोज़ कई लोग इसमें अपनी जान गवां देते हैं। आंकड़े बताते हैं कि सड़क दुर्घटना में मरने वालो की संख्या दुपहिया वाहन वालो की ज्यादा होती है। क्योकि तेज़ स्पीड में अगर ब्रेक लगाये तो संतुलन बिगड़ना लाज़मी है।
अपने बच्चों को तो बाइक का चस्का बिल्कुल न लगने दें। उन्हें इतनी समझ होनी ही चाहिए कि क्या अच्छा है और क्या बुरा। अपने बच्चे को,जिगर के टुकड़े को जिन्दगी दे न कि मौत का सामान। नहीं तो जिन्दगी भर का दुःख उठाना पड़ सकता है । जिसकी भरपाई नामुमकिन है। अगर कुछ बचता है तो वो है आँखों में पानी.....और कभी न भरने वाला जख्म....
पूजा सिंह आदर्श

Sunday, 8 May 2011

मदर्स डे पर विशेष:माँ की खिदमत ही इबादत है.....


माँ......नाम है एक खूबसूरत एहसास का,माँ...जिसमे समाई है पूरी दुनियाजिसकी तुलना इस जहाँ में किसी और से नहीं की जा सकतीमाँ के बारे में क्या लिखूं???? कहाँ से शुरू करूँ ,कुछ समझ में नहीं आताहमारा जन्म ही जिसके अंश से हुआ हो,जिसने अपने खून से हमें सींचा हो, महीने हमें अपने अंदर छुपा कर रखा हो,अपने निवाले से पहले हमें खिलाया हो,हमें बोलना सिखाया हो,ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया हो,हमारी बीमारी में,हमारी परेशानी में चिंता की सबसे ज्यादा लकीरे जिसके माथे पर आई हो,हमारी हर छोटी-बड़ी जरुरत का ध्यान रखा हो और बदले में अपने बच्चों से कभी कुछ नहीं माँगा और न कभी कोई उम्मीद की। उसके बारें में क्या लिखूं जो बस देना जानती है,त्याग करना जानती है। बच्चों की मुस्कान के साथ जिसकी मुस्कान और तकलीफ के साथ तकलीफ जुडी हो....उस माँ के बारें में लिखने से ज्यादा कोई कठिन कार्य नहीं है। माँ बच्चों के सबसे निकट होती है ,,इसलिए उनकी सबसे अच्छी दोस्त भी होती है।
८ मई को मदर्स डे मानते हैं हम....एक दिन माँ के नाम......अच्छा प्रचलन है है...होना भी चाहिए एक दिन माँ के लिए। जब साल के ३६४ दिन वो हम सब को देती है तो एक दिन उसे भी समर्पित होना चाहिए। इस दिन कुछ स्पेशल करतें हैं बच्चे माँ के लिए,उसके लिए कुछ खास बनातें हैं,उसे उपहार देते हैं,प्यार व मान-सम्मान देते हैं।
इस मदर्स डे पर मेरा मन उन लोगों के लिए लिखने को किया जो माँ-बच्चों के रिश्ते को ही भूल गए हैं। जो लोग अपने माता-पिता को ही भूल गए हैं जिन माँ-बाप ने उम्र भर सिर्फ अपने बच्चों के लिए ही किया,अपना सब कुछ उन्ही पर न्योछावर कर दिया और उसके बदले में बच्चों ने उन्हें घर से निकाल दिया या फिर उनसे अलग रहने लगे,उनसे कटने और बचने लगे। अपने माता-पिता के लिए समय नहीं है उनके पास। उस माँ के लिए समय नहीं है ,जिसके पास अपने बच्चों के लिए समय के अलावा और कुछ नहीं होता। एक माँ अपने चार बच्चों का ध्यान रख सकती है बिना किसी भेदभाव के,बिना किसी परेशानी के लेकिन चार बच्चे मिलकर एक माँ का ध्यान नहीं रख सकते। बुढ़ापे में उसे प्यार व समय नहीं दे सकते उसे दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर देते हैं। धिक्कार है ऐसी औलाद पर। दुनिया में बहुत से ऐसे माँ-बाप हैं जिन्हें अपने जीवन की सांध्य बेला में अपनों से बस उपेक्षा ही मिलती है और उन्हें किसी वृद्ध-आश्रम की शरण लेनी पड़ती है। ऐसे में मदर्स डे मनाना कितना उचित है ????
हम सभ्य समाज में रहते हुए खुद को सभ्य कहने का दावा करतें हैं। क्या वाकई हम सभ्य हैं ???विदेशों की नक़ल
करके अपने माँ-बाप को खुद से अलग कर देना,उन्हें किसी वृद्ध-आश्रम में भेज देना, ये न तो हमारी सभ्यता है और न ही हमारी संस्कृति। ऐसा विदेश में चलता है क्योंकि वहां की संस्कृति अलग है। वहां तो माँ-बाप ही बच्चों से इतने नहीं जुड़े होते तो बच्चे ही क्या जुड़ेंगे ??लेकिन हमारे यहं ऐसा करना सबसे बड़ा दुष्कृत्य है। इसके आलावा हम मदर्स डे के उपलक्ष्य में ये भी सन्देश देना चाहतें हैं कि जब माँ अपने किसी बच्चे में अंतर नहीं कर पाती,तो फिर बेटियों के साथ भेदभाव क्यों ?कन्या भ्रूण-हत्या जैसा जघन्य अपराध एक माँ कैसे कर सकती है?बेटियां होंगी तभी तो माँ होगी। जब बेटिओं का ही अस्तित्व मिटा दोगे तो ....मदर्स डे कहाँ से मनाओगे??बेटियों को भी जीने दीजिए उन्हें भी हक है... इस दुनिया में अपनी ऑंखें खोलने का।
माँ तो एक सुखद छाँव है,जिसके नीचे बच्चों को आसरा मिलता है। एक दिन माँ के नाम नहीं बल्कि अपनी तमाम जिन्दगी भी उसके नाम कर दे तो कम है। हर दिन उसका है,उसकी खिदमत में ही पूरी जिन्दगी बिता दें तो भी उसका क़र्ज़ नहीं चुका पाएंगे। माँ के क़दमों के नीचे जन्नत होती है,उसकी खिदमत खुदा की इबादत है। यही इबादत हमें जन्नत का रास्ता दिखाती है और माँ की दुआएं हमें बुलंदियों तक पहुँचाती है।माँ के बारें में जनाब मुनव्वर राना ने क्या खूब लिखा है कि .....
लबों पे उसके कभी बददुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फा नहीं होती।
पूजा सिंह आदर्श

Saturday, 7 May 2011

मेरी माँ...सा कोई नहीं......

रिश्ते तो और भी हैं हमारी हयात में
माँ..सा मगर नहीं है कोई कायनात में,
माँ ने हमें जन्म दिया,दुनिया में पहचान दी
ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया,
उसी ने हमें इंसान बनाया
गीले में सोकर हमें सूखे में सुलाया
अपना निवाला भी हमें खिलाया
अपने बच्चों के लिए वो सब सहती है
मगर मुहं से उफ़ तलक न कहती है
हर दुःख, हर तकलीफ वो उठाती है
क्या उसके प्यार में कोई कमी आती है
बच्चे तो उसके जिस्म का हिस्सा हैं
उनमे.. फर्क वो कहाँ कर पाती है
माँ के क़दमों के तले ही मेरी जन्नत है
उसकी खिदमत ही बस मेरी मन्नत है
माँ की गोद से बढ़कर कोई मखमल नहीं
उसकी मुस्कान से सुंदर कोई फूल नहीं
मेरी माँ की दुआओं का ताबीज साथ रहता है
हर मुसीबत से वो मेरी हिफाज़त करता है
माँ...... की जगह ले पाया है कौन ??
उसका क़र्ज़ अदा कर पाया है कौन ??
माँ...... हम कर्जदार हैं तेरे ये क़र्ज़ न उतरेगा
लेकिन माँ की खिदमत का सबाब जरूर मिलेगा।
पूजा सिंह आदर्श

Friday, 6 May 2011

दि मोस्ट वांटेड: अभी जिन्दा है दुनिया का सबसे खतरनाक शख्स....


लादेन मारा गया,आख़िरकार अमेरिका ने उसकी मौत पर अपनी मोहर लगा दीजहाँ वो छिपा हुआ था मौत भी उसे वहीँ मिलीपाकिस्तान की सरजमीं जो उसकी पनाहगाह थी,उसकी कब्रगाह भी बनी।उसकी मौत के साथ आतंकवाद से जुड़ा एक अध्याय ख़त्म हो गया। लेकिन लादेन की मौत के बाद उठा सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या उसकी मौत के बाद दुनिया महफूज़ हो गई है????क्या अब आतंकवाद,दहशतगर्दी से हमें छुटकारा मिल गया है???? तो इस सवाल का जवाब सुनने के लिए तैयार रहिये.....और जवाब है.. नहीं..हम आज भी महफूज़ नहीं हैं क्योंकि अभी जिन्दा है वो शख्स जिसे अल्बर्ट किंग ने दुनिया का सबसे खतरनाक शख्स कहा है। उसके सर पे भी दहशतगर्दी का इलज़ाम है। वो भी दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी संगठनों में से एक लश्कर-ऐ -तएबा की सर परस्ती करता है, उसके सर पर भी हजारों का खून है। वो भी अमेरिका से मुहरबंद अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी है। लेकिन वो ओसामा बिन लादेन की तरह कहीं छिपकर नहीं रहता,उसकी तलाश में सैकड़ों सेटेलाइट और ड्रोन आसमान में नहीं मंडराते। वो करांची के शानदार महलनुमा घर में रहता है,आलिशान पार्टियों की मेजबानी करता है। उसकी दावत में न्योते के इंतजार में पाकिस्तान के तमाम जनरल और नेता रहते हैं। जी हाँ.....ये शख्स है... "दाउद इब्राहिम"। जो अपने जुर्म और दहशत के निजाम को एक कम्पनी की तरह चलाता है-डी-कम्पनी।
ओसामा बिन लादेन को पनाह देने वाला,तमाम आतंकवादी अभियानों का फाईनेंसेर ,परमाणु हथियारों का सौदागर,युवा पीढ़ी की नसों में नशे का ज़हर घोलने वाला। देश के गृह-मंत्री पी.चिदम्बरम यह कह सकतें हैं कि हम अमेरिका की तरह दाउद को निशाना नहीं बना सकते,उनकी कोई मजबूरी होगी लेकिन हिन्दुस्तानी आवाम की कोई मजबूरी नहीं है। लादेन के मारे जाने के बाद हर हिन्दुस्तानी के दिल से यही आवाज़ आ रही कि ...बस हमें दाउद ला दो जिन्दा या मुर्दा...... । १९९३ में मुंबई बम कांड में जो लोग इसकी दहशतगर्दी का शिकार हुए और उसके बाद २६ नवम्बर २००८ को मुंबई हमले में जो लोग मारे गए उनके घरवालों के दिलों से तो यही आवाज़ निकल रही है कि जो हाल लादेन का हुआ वही दाउद का भी होना चाहिए। आइये एक नज़र डालतें हैं उसके काले कारनामों पर-
१-१९९३ में मुंबई बम-कांड-२५७ लोग मारे गए।
२-१९९० में अफगानिस्तान गया,और लादेन से मिला।
३-अलकायदा के साथ गठजोड़ ,अमेरिका ने ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित किया।
४-२००८ में गैंग को लश्कर-ऐ-तैयबा से से जोड़ लिया।
५-अलकायदा के टेरर नेटवर्क को हवाला और हथियारों की सपोर्ट।
६-२००१ में गुजरात में आतंकी घटनाओ के लिए फंडिंग।
७-१९९३ के बाद मुंबई की हर आतंकी घटना में डी-कम्पनी का सहयोग।
८-लश्कर के नौसैनिक विंग की पूरी देखरेख दाउद के हाथ में तथा उसी ने २६/११ की घटना को अंजाम दिया।
ये तो है उसके काले कारनामों का चिठ्ठा जो कुछ उसने अब तक किया है जिससे उसे ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित किया गया । इसके आलावा उसका मेन बिजनेस जिसके बल पर वो करता राज.... अकेले मुंबई में डी कम्पनी का अरबों डालर का टर्नओवर है। रिअल ऐस्टेट,हवाला,ड्रग्स,कांट्रेक्ट किलिंग,सट्टा,फ्लैश,ट्रेड में उसका एक छत्र राज चलता है। अफगानिस्तान से ड्रग्स का कच्चा माल दुनिया भर के माफिया तक पहुँचाने की सप्लाई चेन पर भी दाउद का कब्ज़ा है। अमेरिका और यूरोप में अरबों डालर की सम्पत्ति डी कम्पनी के पास है। इसके अलावा बॉलीवुड में भी डी कम्पनी का अच्छा -खासा दखल है। वो यहाँ पैसा लगाने के साथ-साथ नई रीलिज़ में हिस्सा भी लेता है.. यहाँ उसके टेरर हर कोई वाकिफ है। आई.एस.आई का वो खास आदमी है। इसकी मदद से ही वो देश में गुस सके। १९९३ में धमाकों के बाद दाउद आई.एस.आई की मदद से ही दुबई पहुंचा और उसके बाद करांची। तब से वो लगातार यहीं रह रहा है।
अब इतने खतरनाक इन्सान का इस तरह खुला घूमना क्या उन लोगों के साथ गद्दारी नहीं है... जो अपने ही देश में शहीद हुए,आतंकवाद का शिकार हुए। लादेन तो मारा गया अब दाउद क्या करना है या उसका क्या होगा ? ये देखने वाली बात है। वैसे ओसामा की मौत के बाद उसके साम्राज्य की नीव तो हिल गई होगी। अब वो भी जल्द ही पाकिस्तान से बाहर भागने की फिराक में होगा। पाकिस्तान तो हर जुर्म ,हर गुनाह की पनाहगाह है। पाप का घड़ा भर के छलक तो काफी समय से रहा है लेकिन अब इसके फूटने की नौबत आ गई है और इंशाल्लाह वो दिन दूर नहीं जब इन दरिंदो की पनाहगाह ही इनकी कब्रगाह बनेगी।
पूजा सिंह आदर्श

Wednesday, 27 April 2011

सांप्रदायिक दंगे.....इंसानियत पर सवालिया निशान????


हिन्दू दिखाई दे न मुसलमाँ दिखाई दे
आँखे तरस रही है कि इंसा दिखाई दे।
क्या जिंदगी है नाम इसी का ज़माने में
हर शख्स जिन्दगी से गुजरा दिखाई दे।
धर्म -जात,साम्प्रदायिकता विशेष पहचान है हमारे देश की और इनकी खातिर इंसानियत का दुश्मन बन जाना हमारा अधिकार भी है और कर्त्तव्य भी। जब देश में कोई आतंकी हमला हो या फिर हमारे पड़ोस में कोई चोर बदमाश गुसकर कोई वारदात कर जाए तो कोई भी खुदा या ईश्वर का बन्दा आपकी मदद करने या आपके हक में बोलने के लिए खड़ा नहीं होगा और एकजुट होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि उसे देश से या आपसे मतलब ही क्या है??ईश्वर या खुदा यहाँ मैंने अलग-अलग इसलिए लिखा है कि हमारे देश के ९०% लोग इन्हें अलग ही समझते हैं केवल १०% लोग ही अपनी सोच को बदल पाए हैं,उसमे खुलापन ला पाए हैं कि हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई सब एक ही परमात्मा की संतान हैं। बाकी तो सबके अलग-अलग भगवन हैं।
धर्म-संप्रदाय के नाम पर तो सब मर मिटने को या मरने-मारने को तैयार हो जातें हैं लेकिन जरा ये कह कर तो देखिये कि सीमा पर जरुरत है आपकी.....तो एक भी आवाज़ नहीं निकलेगी। कहने का मतलब ये है कि हम चाहे कितना भी पढ़-लिख जाएँ ,कितनी भी तरक्की कर लें ,लेकिन हम आज भी गुलाम है,बेड़ियों में जकड़े हुए हैं। ये बेड़ियाँ हैं साम्प्रदायिकता की ,जातिवाद की। हमें अंग्रेजों की ग़ुलामी से आज़ादी तो मिल गई लेकिन इनकी दासता से मुक्ति पता नहीं कब मिलेगी??यदि हम साम्प्रदायिकता के गुलाम न होते तो जो तीन दिन पहले मेरठ में हुआ वो न होता। हुआ ये कि कुछ गैर मुस्लिम उपद्रवी तत्वों ने मस्जिद में घुसकर वहां के इमाम से अभद्रता की,मारपीट की,और धर्मग्रन्थ को भी नुकसान पहुँचाया बस फिर क्या था बवाल तो होना ही था।लोग इकट्ठे होकर सड़कों पर उतार आये और देखते ही देखते ये घटना हिन्दू-मुस्लिम दंगे में तब्दील हो गई। मेरठ वही जगह है जहाँ से अमर शहीद मंगल पाण्डेय ने १८५७ में आज़ादी की लड़ाई का बिगुल बजाया था। ऐसी पावन धरती को न जाने क्यों बार-बार अपनी परीक्षा देनी पड़ती है।
मेरठ सांप्रदायिक मामलो में पहले से ही काफी संवेदनशील रहा है। यहाँ हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़कने का इतिहास पुराना है। इस बार भी ऐसा ही हुआ देखते ही देखते पूरा शहर सुलग उठा। चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल,आगजनी,पथराव,भगदड़ और पुलिस की फायरिंग। बसों में आग लगा दी,तीन पुलिस चौकियां फूँक दीं,दुपहिया वाहनों में आग लगाई,कई पुलिस वाले जख्मी हुए। गनीमत ये रही कि कोई हताहत नहीं हुआ। पूरा इलाका छावनी में बदल गया। स्कूल कॉलेज बंद कर दिए गए।
मेरठ में इन दिनों ऐतिहासिक नौचंदी मेला अपने पूरे शबाब पर है और उस रात को भी मेले में भीड़ अपने चरम पर थी। जैसे ही शहर में दंगा होने की खबर फैली मेले में भगदड़ मच गई, लोग अपने घरों की तरफ भागने लगे क्योकि जहाँ दंगा हुआ वो जगह मेले के पास ही है। पुलिस ने बड़ी मुश्किल से भीड़ को काबू में किया तब जाकर स्तिथि नियंत्रण में हो पाई वरना कितना बड़ा हादसा हो सकता था,कितने बेक़सूर लोग मारे जाते। लेकिन इस सब से इन लोगो को क्या सरोकार जो देश की शांति भंग करना चाहतें हैं.जो ये नहीं चाहते कि देश में अमन-चैन कायम रहे। उनका तो मकसद ही ये है कि पहले तो दंगा भड़का दो फिर उसे राजनैतिक रंग दे दो। जान माल का नुकसान हो जाने के बाद शुरू होता है आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला। गाज गिरती है पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों पर । या तो इनका तबादला कर दिया जाता है या जिसकी ज्यादा किस्मत ख़राब हो उसे सस्पेंड। हर हाल में दोषी अफसर ही पाए जातें हैं। अब ये लोग तो गए नहीं थे दंगाइयों को दावत देने कि आओ और लगा दो आग शहर को। इनके पीछे जो असली चेहरें हैं उन्हें बेनकाब कोई नहीं करना चाहता क्योंकि जो ये सब कर रहें हैं उसमे इन लोगों का अपना फ़ायदा है।
राजनेताओं से,शहर के मेयर से,आला अफसरों से क्या उम्मीद की जा सकती है???ये बेचारे तो खुद ही इतने व्यस्त हैं कि इनके पास आम जनता के लिए समय ही नहीं है....न समय है,न नीयत है। हमें आदत पड़ गई है बात-बात पर इनके तलवे चाटने की। इनका इलाज तो ये है कि इनके किसी सड़े हुए अंग की तरह काट फेंकों तभी इन्हें अपनी असली औकात पता चलेगी। हमें ही समझना होगा...अपने आप को और अपनी सोच को बदलना होगा कि सब धर्म सामान है,उनके साथ न तो किसी किस्म की अभद्रता स्वयं करे और न दूसरों को करने दे।जिस प्रकार हमें अपना धर्म प्रिय है उतना ही सम्मान आप दूसरें धर्म को भी दें।दूसरे धर्म का अपमान बर्दाश्त करना मानवता नहीं है। यदि किसी ने कोई ऐसी शर्मनाक हरकत की है तो उसकी शिकायत पुलिस-प्रशासन से करें न कि भावनाओं में बहकर दंगा -फसाद करें। अरे.... धर्म-जात तो बाद में है सबसे पहले तो हम इन्सान हैं,,,,हम सब भारतीय हैं.लड़ाई झगडे से तो अपनों को ही नुकसान पहुंचा रहे हो......बस एक बार अपनी अंतरात्मा से पूछ कर देखो कि जिन घरों में आग लगा रहे हो.... क्या वो आपके अपने नहीं हैं?????????मुट्ठी भर स्वार्थी लोगों के बहकावे में आकर अपनों का घर मत जलाइए।
इस घटना पर मुझे अपने ही शहर में अपनों का दंश झेल चुके डा.बशीर बद्र का एक शेर याद आता है कि.....
लोग टूट जातें हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
पूजा सिंह आदर्श

Thursday, 21 April 2011

फीकी पड़ती जा रही ज़री कारीगरी की चमक......


हमारे देश में बहुत सी जगह ऐसी हैं जिनकी पहचान या तो वहां पैदा होने वाली चीजों से होती है या फिर वहां के उद्दयोग -धंधो सेजैसे-लखनऊ अपनी चिकिनकारी,अलीगढ अपने ताला उद्दयोग,मेरठ कैंची खेल का सामान बनाने के लिए,मुरादाबाद पीतल उद्दयोग के लिए विश्व-प्रसिद्ध है ठीक वैसे ही उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शहर बरेली जो बांस-बरेली के नाम से भी जाना जाता है अपने ज़री-ज़रदोज़ी के काम के लिए भी शुरू से ही जाना जाता है। वैसे तो बरेली में और भी उद्दयोग धंधे हैं जिनके लिए बरेली विश्व-प्रसिद्ध है...आइये एक नजर इन् पर भी डालते हैं-बांस(केन)उद्दयोग,इमारती लकड़ी से बना फर्नीचर उद्दयोग,पतंग व मांझा उद्दयोग और बेहद प्रसिद्ध आँखों में डाले जाने वाला सुरमा। इन सबके ऊपर बरेली की असली पहचान है यहाँ की परंपरागत ज़री-ज़रदोज़ी...जिसके कारण ही बरेली को नाम दिया गया ज़री नगरी। ज़री के काम की खासियत ये होती है कि ये काम हाथ से किया जाता है,इसमें किसी भी तरह की मशीन का कोई इस्तेमाल नहीं होता है। हाथ से किया गया ये काम इतना बारीक़ और खूबसूरत होता है कि कोई भी इसकी तारीफ किए बिना नहीं रह सकता। हाथ से की गई इस कारीगरी में एक डिजाइन को पूरा करने में कई-कई दिन लग जाते हैं। लकड़ी का अड्डा(फ्रेम)बनाकर उसमे सलमा-सितारे,कटदाना,कसब,नलकी,मोती,स्टोन आदि बड़ी सफाई टांके जाते है। जितने कम दामो पर इसका मैटीरीयल आता है और जितने कम मेहनताने पर ये तैयार हो जाता है और उतनी ही ऊँची कीमत पर डीलर व दुकानदार ग्राहकों को बेचतें हैं। हाथ की इतनी सफाई व आकर्षक कसीदाकारी देखकर ग्राहक मुहं मांगे दाम देकर खरीदता है। मिसाल के तौर पे अगर कोई परिधान १००० में तैयार होता है तो दुकानदार इसे दुगने दाम में बेचकर डबल मुनाफा कमाता है। लेकिन यहाँ यह सब लिखने का क्या तात्पर्य है.....ज़री कारीगर को इस मुनाफे से क्या मिलता है?कुछ नहीं ....इस लिए ये हुनर धीरे-धीरे कम होता जा रहा है । मेहनत ज्यादा और मजदूरी कम इस बात ने कारीगरों के हौसले को तोडना शुरू कर दिया है अब वे इस काम को करने में रूचि नहीं दिखा रहे हैं। जो कम उन्हें दो वक़्त की रोटी ठीक से नहीं दे पा रहा हो उसे करने से क्या फ़ायदा है। इसलिए ये लोग अपने लिए दूसरा रोज़गार तलाशने लगे हैं। लेकिन उनके पास रोज़गार का कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं है। बारीक़ सुई पकड़ने के आदि हाथ कोई दूसरा औजार कैसे पकड़ सकते हैं। ज़री कारीगर ये रोज़गार अपनी ख़ुशी से छोड़ने को तैयार नहीं है। अगर उन्हें भी अपनी मेहनत की अच्छी मजदूरी मिले तो वे इस खूबसूरत कला को आगे कई वर्षों तक चला सकतें हैं। इस कला के सामने एक समस्या और भी है कि भावी पीढ़ी इसमें कोई रूचि नहीं दिखा रही है इनका मानना है कि जो काम हमारे बाप-दादा ने किया बस उतना ही काफी है। इस रोज़गार ने उनका ही क्या भला किया ????इसमें हमारा कोई भविष्य नहीं है। पुराने कारीगरों के बच्चे अपने पुश्तैनी काम से दूर होते जा रहे हैं,जिससे ज़री कारीगरी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
कुछ अपनों की उपेक्षा,कुछ सरकार की उपेक्षा ने इन हुनरमंदों का मनोबल तोड़ सा दिया है। मुग़ल काल में नूर जहाँ ने जिस कला को प्रोत्साहन देकर उसे आज तक जिन्दा रखा ,,आज सरकार उसकी अनदेखी कर उसे लुप्त होने पर विवश कर रही है। बदलते फैशन के इस युग में चाहे कितनी भी क्रांति क्यों न आ जाए लेकिन ज़री-ज़रदोज़ी के बिना फैशन पूरा नहीं होता। ज़री कारीगरों का अस्तित्व बचाने के लिए जरूरी है कि इन कारीगरों को बचाया जाए तभी हम इस नायाब कला को सहेज कर रख पाएंगे।
पूजा सिंह आदर्श